मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

गर्मी में लोनावला खंडाला रोड ट्रिप



फेसबुक की आभासी दुनिया से अनेक मित्र मिले हैं, जिनमे से मिथिलेश और शुभानन्द जी भी एक है, तीनो को एक सूत्र में पिरोया उनके लेखन के शौक ने, शुभानन्द जी मंझे हुए थ्रिलर लेखक है जिनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, मिथिलेश जी से पुराने ग्रुप्स से पहचान थी, उनकी भी लगभग तीन पुस्तकें प्रकाशीत हो चुकी है, मेरे खाते में भी एक पुस्तक है जो मेरी लिखी हुई है, और दूसरी प्रकाशित होने वाली है  
मै नीली टी शर्ट में, शुभानन्द जी मध्य में और मिथिलेश जी काली टी शर्ट में 
यहाँ इस भूमिका को बाँधने का एक ही उद्देश है और वह यह कि हम तीनो का जो तालमेल है उसे समझने में सहजता होगी
एक ही महीने पहले तय हुई योजनानुसार हैद्राबाद के रहने वाले मिथिलेश जी का मुम्बई आगमन हुआ, शुभानन्द जी नवी मुंबई के आसपास रहते है जो की मेरे यहाँ से कुछ पैतीस किमी के फासले पर पड़ता है मिथिलेश जी बस से आ रहे थे और लगातार सम्पर्क में बने हुए थे, तीनो का वाशी में मिलना तय हुआ जो की नवी मुंबई का एक शहर है शुभानन्द जी और मिथिलेश अपने गंतव्य पर पहुंच गए, किन्तु मैं उनसे मुश्किल से 500 मीटर की दूरी पर होकर भी भटकता रहा, काफी जद्दोजहद और भटकने के बाद मैं वहां पहुंचा, यह वाकई अजीब था जब मेहमान गंतव्य पर पहुंच गया और मेजबान ही रास्ता भटक गया, इस बार गूगल मैप ने धोखा दे दिया, जिसके चक्कर में आकर मै फंस गया और भटकते रहा
तीनों गर्मजोशी से एकदूसरे से मिले, और मजे की बात यह कि उस समय तक हमने तय नही किया था
कि आखिर जाना कहां है? तीनो का केवल मिलना तय हुआ था ताकि हम अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स पर कुछ चर्चा कर सके, कोई विशेष योजना नही बनी थी, वैसे भी गर्मी के दिन होने के कारण मुम्बई के आसपास घुमने के लिए जितनी भी जगहें पता थी वे सभी गर्म रहती है, हिल स्टेशन के नाम पर माथेरान वगैरह है किन्तु एक बार चोपता-तुंगनाथ जाकर आने के पश्चात यह सब गर्म स्थल ही प्रतीत होते है वैसे भी माथेरान वगैरह अब पहले की तरह ठंडे नही है, तापमान में कुछ ज्यादा फर्क नही मिलता वहा  जब कुछ समझ में न आया तो हम बिना कुछ सोचे समझे लोनावला की ओर निकल लिये, शुभानन्द जी की कार होने के कारण घुमने फिरने की पूरी सहूलियत थी मिथिलेश जी को खंडाला जाने की इच्छा थी, वो बस फिल्मों में नाम सुनकर उत्साहित थे, हमने उन्हें समझाया लोनावला खंडाला में ज्यादा फर्क नही है, सब मात्र पैदल कदमों की दूरी है, मार्ग में हमने एक स्थान पर रुक कर कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया और फिर से अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए,हम मुश्किल से 3 घण्टे के भीतर ही लोनावला पहुंचे और ज्यादा दौड़भाग किये बिना ही एक बढ़िया सा कॉटेज भी बुक कर लिया । दिन भर हम कड़ी धूप में घूमते रहे, प्रोजेक्ट्स के सिलसिले में काफी चर्चा और वर्कशॉप हुई,  खाने के लिए ऑर्डर करने का विचार हमने मेनू देखकर ही छोड़ दिया, खाना हद से ज्यादा महंगा था,
और यदि आपको घुमक्कड़ी का शौक है तो आपको फिजूल खर्ची से बचना चाहिए, वही हमने भी किया और खाने की तलाश में बाहर निकल गए, दो चार रेस्टोरंट में हमने मेनू और रेट्स चेक किये, हर जगह खाना हद से ज्यादा महंगा था, आख़िरकार कुछ दुरी पर हमे एक नया खुला हुआ ढाबा मिला, जहां मेनू वगैरह तो नही था किन्तु घर जैसा भोजन मिलेगा लिखा हुआ था, शुभानन्द जी और मिथिलेश भाई का पेट गडबड था तो घर का खाना ही उनके लिए सही था, हमने ज्यादा कुछ सोचे बगैर खाना मंगवा लिया, और वाकई में साधारण से दिखने वाले उस ढाबे का खाना रेस्टोरंट के खाने के मुकाबले कही ज्यादा स्वादिष्ट था
 जब हम बिल भरने गए तब पता चला जितने दाम में बाकी रेस्टोरंट में हमे एक आदमी का खाना मिल रहा था उतने में यहाँ तीनो का हो गया था, हमने रात्री का मेनू पूछा और तय किया की दोबारा यही आयेंगे उसके बाद हमने एक वैक्स म्यूजियम में भेंट दी, जहां काफी सेलब्रिटीज के वैक्स की प्रतिकृतियाँ बनी हुई थी, हमने वहां काफी मस्ती की, वैसे हमे लोनावला में इफरात में वैक्स म्यूजियम्स देखकर काफी हैरत हुई, मिथिलेश जी तो चारो ओर केवल चिक्की ही चिक्की के बैनर देख कर चकराए हुए थे फिर हमने चलते फिरते कुछ अगली योजनाओं का खाका बनाया फिर बाहर चाय पीने की योजना बनी और चाय के चक्कर मे दस किलोमीटर तक चले गए, जहा गए थे वहां का दृश्य बेहद सुंदर था, वह खंडाला का प्रसिद्ध व्यू पॉइंट था जो बरसात में काफी सुंदर और झरनों से भरा हुआ दिखाई देता है, किन्तु इस समय वहां केवल ऊँचे पर्वत और सूखे हुए जंगल ही दिखाई दे रहे थे
हम अंधेरा होने के बाद तक वही बैठे रहे
, ढेर सारी गपशप की और शाम को फेसबुक पर लाइव आये, हालांकि देर हो गई थी । और संयोग यह हुआ कि अगले दिन मिथिलेश का जन्मदिन भी था । अगले दिन हमने 12 बजे कॉटेज छोड़ दिया और यू ही जहां गाड़ी निकले वही निकल लिये, गाडी चलती रही मैंने अपने मोबाइल से पिंक फ्लॉयड का हाई होप्स बजाया तब पता चला शुभानन्द जी भी पिंक फ्लॉयड के बड़े फैन है, फिर क्या था नए नए गाने और कभी ण खत्म होता पहाड़ी घुमावदार रास्ता, बढ़िया समा बंध गया, पिंक फ्लॉयड से शुरू हुआ सफर हिंदी, पंजाबी गानों से होते हुए अंत में भोजपुरी गानों पर आकर समाप्त हुआ  हमने इस विषय में चर्चा भी की कि किस प्रकार कुछ ही घंटे में लोगो की पसंद कहा से कहा पहुँच जाती है लगभग दो घण्टे पश्चात हम एक बड़े से सुंदर तालाब के समीप पहुंच गए जहां नीरव शांति थी, यह पौना लेक था  पहाड़ो के ऊपर से हम नीचे तालाब की ओर पैदल ही मार्च कर लिये और वहां पहुंचकर काफी मस्ती की । चिलचिलाती धुप में हम पहाड़ी से निचे उतरते हुए तालाब की ओर बढने लगे, मार्ग में करौन्धो की झाड़ियाँ मिली तो हमने दांत खट्टे होने तक करौंधे खाए, तालअब काफी विशाल और स्वच्छ था, वहा काफी ठंडक थी, हमने पानी के छपाके अपने चेहरे पर मारे और काफी देर तक तालाब के किनारे बैठे रहें, हमने वहाँ की काफी तस्वीरें ली और यादगार के तौर पर कुछ वीडियोज भी बनाये अब चलने का समय था, शाम तक वापस वाशी पहुंचना था क्योकि मिथिलेश की साढ़े आठ बजे की बस थी हैद्राबाद की । तो हम वहां से निकले, रास्ते मे एक ढाबे पर मिथ के जन्मदिन के उपलक्ष्य में शानदार और स्वादिष्ट खाने का लुत्फ उठाया, वहां हमने काफी मजेदार क्षण बिताए, क्या शुभानन्द जी क्या मैं क्या मिथिलेश, तीनों मिमिक्री करते रहे, शक्ल से गंभीर नजर आने वाले शुभानन्द जी भी हमारी तरह मस्तीखोर ही निकले
ढेर सारी वीडियोज और तस्वीरें खींची गई
। फिर हम कुछ ही घन्टों में पुनः वहां पहुंच चुके थे जहां से मिथिलेश और शुभानन्द जी ने मुझे पिक अप किया था। वहां एक छोटे से केक शॉप में जाकर पेस्ट्री के रूप में ही हमने जन्मदिवस मनाने की खानापूर्ति भी कर ली । आखिरकार बस भी आ गई और मिथिलेश को फिर मिलने के वादे के साथ विदा कर दिया गया, शुभानन्द जी के साथ मैं स्टेशन वापस आया और फिर मिलने के वादे के साथ हमने विदा ली कुल मिला कर अचानक बनी हुई योजना और सफर प्लानिंग करके गए हुए सफर से अधिक रोमांचक साबित हुई यह कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी, मैंने कॉटेज में उन्हें चोपता में बिठाये हुए दिनों की तस्वीरें और विडियोज उन्हें दिखाए तो वे मंत्रमुग्ध से रह गए, और अगली योजना नवम्बर में चोपता-तुंगनाथ-चन्द्रशिला की तय हुई, मैंने उनसे वादा भी किया कि चोपता-तुंगनाथ की यात्रा आप सबके जीवन की सबसे अविस्मर्णीय यात्रा होगी
  और हाँ इस यात्रा के विडियोज को मैंने एक यादगार के रूप में एडिट करके यूट्यूब पर भी डाल दिया जो आप इस लिंक के पर जाकर देख सकते हैं
नवम्बर में मिलने के वादे के साथ हमने एकदूसरे को विदा किया


गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

दिल्ली क्राइम : वेबसीरिज

वेबसिरिज के रूप में नेटफ्लिक्स ने 'दिल्ली क्राइम' नाम से एक उम्दा सीरीज बनाई है। यह पहली सीरीज है जिसे इतनी जल्दी समाप्त किया। निर्भया केस पर होने के कारण मैं इसे देखने से कतरा रहा था, मैं उस घटना का सजीव चित्रांकन देखने का साहस नही जुटा पा रहा था, किन्तु जब पता चला सीरीज उस घटना के पश्चात अपराधियों के पकड़ने की जद्दोजहद और इन्वेस्टिगेशन पर आधारित है, तब देखना आरम्भ किया और एकदम से बंध सा गया, उस घटना की भयावहता को अतिरंजकता से बचते हुए भी पर्याप्त गम्भीरता से दर्शाया गया है जो वाकई रोंगटे खड़े कर देता है। पुलिस की जांच और छोटे से छोटे सुराग के सहारे रात दिन दौड़ भाग करके अपराधियो तक पहुंचने की प्रक्रिया इतनी जबरदस्त है कि बिना किसी ड्रामे के भी आप दम साधे देखते रह जाते है। यह निस्संदेह ही इस साल की अब तक कि बेस्ट वेब सीरीज है यह कहना कोई अतिशयोक्ति नही होगी। फिल्मांकन और प्रस्तुतिकरण इतना चुस्त और रोमांचक है कि कब 7 एपिसोड्स समाप्त हो जाते है पता ही नही चलता, विक्टिम की पीड़ा, उससे जुड़े लोगों की बेबसी, पुलिस टीम की जांच, दिन रात अपने हालातों और परिस्थितियों से समझौता करते हुए असली अपराधियो तक पहुंचने के लिये बेचैनी से आप खुद ब खुद जुड़ जाते है, सीरीज के अंत तक आप खुद ब खुद पुलिस के प्रति अपनी नकारात्मक सोच में थोड़ा तो बदलाव अवश्य महसूस करते है । यह मत समझिये कि यह कोई डॉक्यूमेंट्री या नीरस ड्रामा है, नही कतई नही, यह एक तेज रफ्तार सीरीज है जिसके पहले एपिसोड से ही आप इसके अंत के लिये बेचैन हो उठते है।
बाकी इसका सशक्त पहलू इसके कलाकार भी है, हर छोटे से बड़े करेक्टर ने अपने चरित्र को इतनी सजीवता से जीया है कि लगता ही नही वे एक्टिंग कर रहे है, बिना किसी बनावटी या ओवर ड्रामेटिक दृश्यों के बगैर भी हर करेक्टर अपनी स्वतंत्र छाप छोड़ता नजर आता है।
वैसे वेबसिरिज ट्रेंड में आने से एक बात तो अच्छी हुई है और वह यह कि न जाने कितने ही भुला दिए गए और कमतर आंके गए कलाकारों को उनकी क्षमता दिखाने का एक सही प्लेटफॉर्म और अवसर प्राप्त हुआ है।
मैं रेटिंग वगैरह नही दे सकता, बस इतना कहूंगा मौका मिले तो देख लीजिये, निराश नही होंगे।
अंत मे मन मे कहीं एक प्रश्न अवश्य रह गया, इस भयानक कांड में सम्मिलित सारे अपराधी बेहद गरीब तबके और छोटे क्षेत्रों से संबंधित थे, इसके बावजूद उन्हें पकड़ने और चार्जशीट दायर करने में सारे पुलिस महकमे के दांतों तले पसीना आ गया, यदि इनके बजाय अपराधी रसूख और पैसेवाले होते तब क्या हालत होती ? इसके प्रमोशन में एक टैगलाइन प्रयुक्त की जाती है, केस जिसने सारे देश को बदल कर रख दिया।
लेकिन क्या वाकई कुछ बदला नजर आता है?

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

तुंगनाथ-चोपता यात्रा-4 ( अंतिम भाग )

पिछले 3 भागो की श्रृंखला में मैंने ऋषिकेश से चोपता और चोपता से तुंगनाथ की 
ट्रैकिंग और उसमे आई कठिनाइयों का वर्णन किया, जिसमे बाघ का देखा जाना,
रिवर राफ्टिंग के पहले 

 जिसके पश्चात रात्रि ट्रैकिंग की योजना खारिज कर देना, माइनस तापमान,सड़क पर 
बर्फ जमी होने के कारण 3 किलोमीटर अधिक ट्रैक करना, ऑक्सीजन की कमी और एक
 से डेढ़ फीट बर्फ के कारण हुई थकान, खराब मौसम और कम समय के कारण तुंगनाथ जाकर भी 
चंद्रशिला की योजना खारिज करना, वापसी में दोनो कलाइयां और पीठ तुड़वा कर पस्त होना 
इत्यादि का सविस्तर वर्णन किया। जिसे आप तुंगनाथ-चोपता यात्रा-1तुंगनाथ-चोपता यात्रा-2 और 
तुंगनाथ-चोपता यात्रा-3 पर क्लिक करके पढ़ सकते है 
तुंगनाथ से वापस आते ही हमने अपने कैम्प से चेक आउट किया , वे रोकते समझाते रह गए की 
रात्रि में गाड़ियां देवप्रयाग से आगे नही जा पाएंगी इसके बावजूद हम नही माने और उनकी 
बेहतरीन सुविधा और सेवा के लिये सबके गले मिलकर धन्यवाद दिया। 
शाम होते ही फिर वही हाड़ गला देने वाली ठंड आरम्भ हो गई जो हमने आते समय महसूस की थी, 
कांपते हुए किसी प्रकार मैंने अपना रकसैक गाड़ी की डिक्की में रखा, गौरतलब है की दिल्ली में 
हमारे पास तीन बैग्स भरकर सामान थे, साली जी की एक ट्रॉली बैग, श्रीमती जी का बैग और
 मेरा 70 लीटर का रकसैक जो मैंने हाल ही में यात्रा के लिये ही खरीदा था। दिल्ली से हरिद्वार,ऋषिकेश
 और चोपता आने पर हमें तीनो बैग लाने पड़ते जो काफी असुविधाजनक होता। 
तो मैंने सबके दो-दो।एक्स्ट्रा कपड़े और जरूरत का साहित्य केवल अपने रकसैक में रखने के लिये कह 
दिया था जिससे केवल एक रकसैक में तीनों का काम हो जाता और कठिनाई भी नही होती।
हम दिल्ली के जिस होटल में ठहरे थे वही अपने बाकी दोनो बैग्स छोड़ दिये, 
उस होटल में मेरे साले साहब की पहचान थी जिस कारण बैग वहां सुरक्षित थे और
 हमारे जाने के पश्चात साले साहब बैग्स कलेक्ट करके अपने घर पर रख देते जो दिल्ली में ही है। 
खैर इस यूटिलाइजेशन का मुझे बड़ा लाभ हुआ, क्योकि केवल एक रकसैक कंधे पर टांगे घूमना 
कही ज्यादा सुविधाजनक और आरामदेह था बजाय तीन सूटकेस नुमा बैग लटकाए।

 यदि आपको कम समय मे अधिक और लम्बी यात्राएं करनी हो तो कोशिश कीजिये के 
आपके पास बोझ कम हो, फैशन के चक्कर मे पड़ने के बजाय केवल काम के और उपयोगी कपड़ों 
को ही तरजीह देना चाहिए, इससे आप पर अनावश्यक थकान और बोझ नही पड़ता और यात्रा सुगम होती है।
अब हम गाड़ी में थे, शाम के 6 बज रहे थे, लेकिन अंधेरा इतना घना हो चुका था मानो रात 
के बारह बज रहे हो, पहाड़ों में वैसे भी समय का अंदाजा नही लग पाता। मैं तो चोपता में आकर दिन 
और तारीख तक भूल गया था। ड्राइवर बार बार समझाते रहे के हमे रुक जाना चाहिए था,
 मैंने समझाया कोई बात नही, यदि चेक पोस्ट वाले देवप्रयाग पर रोक देंगे तो वही होटल में रुक जाएंगे 
और घाट पर भी चले जायेंगे। 
इसी बीच साले साहब का फोन आया के वे दिल्ली से हरिद्वार पहुंचने वाले है, वे इतने वर्षों से 
दिल्ली में है इसके बावजूद हरिद्वार,और ऋषिकेश से पूर्णतया अनजान है। 
मुझे हैरानी तब हुई जब पता चला के उन्हें हर की पौड़ी और राम झूला,लक्ष्मण झूला तक के नाम नही पता।
 खैर मैंने उन्हें हरिद्वार बस स्टैंड से ऋषिकेश के लिये बस पकड़ने का सुझाव दिया और लक्ष्मण झूला वाले
 इलाके में होटल बुक करने के लिये कहा।
दिल्ली से हरिद्वार आने का सबसे बुरा अनुभव रहा, एक तो हम 11 घण्टे में पहुंचे, 
दूसरे हरिद्वार में ऑटो वालो ने लूट मचा रखी थी, हम जहां उतरे थे वहां से हर की पौड़ी मात्र 3 किमी 
था लेकिन ऑटो वाले 700 से 1000 तक का मुंह फाड़ रहे थे, दूसरी परेशानी यह हुई के 
ऋषिकेश और हरिद्वार में ओला वगैरह नही चलती, बस मैप ही एक सहारा है। 
किसी प्रकार एक साइकल रिक्शा वाले अंकिल ने हमे मुख्य चौराहे तक पहुंचाने के 
लिये कह दिया जहा से किफायती दाम में ऑटो मिल जाती। व्वे बुजुर्ग थे तो मैं रिक्शा
 में बैठने के बजाय श्रीमती जी और साली जी को बिठा कर उनके पीछे पैदल ही निकल चला, 
रास्ते मे कई बार मैंने उनसे साइकिल चलाने का आग्रह किया लेकिन वे नही माने तो भाई हमने
 दो किमी उन्हें साइकिल पीछे से धकेल कर सहायता प्रदान की। वे रास्ते भर ऑटो और वैन वालो 
को गरियाते रहे के लूट मचा रखी है, धर्म की नगरी में अधर्मी यही तो है, श्रद्धालु एवं अनजानों को लूटते है,
 भगवान सब देख रहा है, केदारनाथ ऐसे ही नही बहा था, पाप यहां भी बढ़ रहा है, गंगा मैया
 ही अब सब ठीक करेंगी किसी दिन। 
खैर जहां उन्होंने रोका वहां से मोलभाव करने के पश्चात एक ऑटो वाला 150 में तैयार हो गया
 होटल तक जो गीता भवन के पास ही कही था। जब हम रास्ते मे निकले तब पाया के उसके चार्जेस वाजिब थे, 
मुख्य चौक से हमारे होटल तक का अंतर 7 किमी था। और पूरा रास्ता एकदम निर्मानुष्य भी था।
हरिद्वार का यह अनुभव अब तक मेरे जेहन में था। खैर अब हमारी कैब पूर्ण गति पर थी, 
संयोग अच्छा रहा के जाते समय कही रोड कटिंग और ट्रैफिक नही मिली और हम जस्ट फाटक बंद होते 
होते देवप्रयाग पहुंचे। फिर भी चेक पोस्ट वालों ने आगे बढ़ने देने से मना कर दिया, 
माँ गंगा, हरिद्वार, हर की पौड़ी 

ड्राइवर ने बहुत आग्रह किया वे नही माने तो मैं खुद गया और उनसे निवेदन किया हम काफी दूर से आ 
रहे और बहुत दूर जाना है, ऋषिकेश पहुंचना अत्यंत आवश्यक है, चोपता में अत्यधिक ठंड से तबियत 
भी खराब हो चुकी है तो हम यहां इस ठंड में नही रुक सकते, उस समय वाकई मुझे तीव्र बुखार हो चुका था,
 पता नही अफसर के मन मे क्या आया की उन्होंने गाड़ी नम्बर और ड्राइवर की पूर्ण जानकारी 
दर्ज करके हमे जाने दिया। 
अब गाड़ी सरपट थी, आते समय जहाँ हमे 11 घण्टे लगे थे, जाते समय हम 8-9 घण्टे में ही पहुंच गए थे,
 साले जी ने लक्ष्मण झूला के समीप ही होटल बुक कर लिया था, मुझे लोकेशन मिल चुकी थी 
तो कैब सीधे होटल तक ले गए और उनकी पेमेंट करने के पश्चात होटल में प्रवेश किया। 
साले जी अब साथ थे, मेरे मुंह से अत्यधिक थकान के कारण बोल न फुट रहे थे, 
सम्पूर्ण शरीर दर्द कर रहा था, बुखार के कारण आंखे मानो जल रही थी, कमरे में पहुंचकर मैंने 
बिना एक शब्द कहे बैग पटक दिया और जल्दी से कपड़े बदल कर बिना हाथ मुंह धोए ही बेड पर जा गिरा, 
साले जी मेरा ऐसा रूखा व्यवहार देखकर दुखी हो गए, मैंने बस इतना ही कहा के अभी बात
 करने की हालत में नही हु।
और उसके पश्चात मैं फौरन सो गया, अपनी 31 साल की जिंदगी में मुझे याद नही की मैं कब
 बिस्तर पर पड़ते ही एक मिनट के भीतर सो गया था, वो तो श्रीमती जी ने जबरन क्रोसिन खिलाने के
 लिये जगा दिया। अगली सुबह भी नौ बजे उठा तब थोड़ा सही लगा, बुखार उतर चुका था, साले जी से
 जी भर कर बात चीत की और उन्हें चोपता की थकान भरी यात्रा और अपने चोटिल होने की पूरी कहानी बताई,
 साथ ही साथ पुनः साली साहिबा को धन्यवाद दिया जो उन्होंने मेरी इतनी सहायता की जिसके बगैर मेरा
 वापस लौटना एक स्वप्न ही था। 
अब यहां आकर साली जी को एडवेंचर करने थे, वे रिवर राफ्टिंग के लिये उत्साहित थी। 
मेरे दोनो हाथ दुख रहे थे, एक कलाई में सूजन भी थी, तो मैं रिवर राफ्टिंग नही कर सकता था,
 वैसे मैं करना भी नही चाहता था। मुझे डर लगता था।
तब साली जी ने अपने भाई को इसके लिये तैयार किया, जब साली जी तैयार होने चली गई तो साले 
साहब ने पूछा ये रिवर राफ्टिंग में क्या होता है जीजा जी? मैंने उन्हें यूट्यूब पर वीडियोज दिखाए तो 
उनके होश फाख्ता हो गए। जब साली जी आई तो वे मिन्नते करने लगे की मत जाओ, बहुत खतरनाक है, 
पैसे भी दो और जान भी जोखिम में डालो यह कहा कि समझदारी है? वे अकेले ही जाने के लिए तैयार हो गई,
 उन्हें हर हाल में रिवर राफ्टिंग करनी ही थी।
अब भला उन्हें अकेले कैसे जाने देता तो मरता क्या न करता सोचकर मैं तैयार हो गया ।
फिर हमने नीचे एक एजेंसी से बात की, 500 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से बात तय हुई, 
एजेंसी में विविध प्रकार के एडवेंचर स्पोर्ट्स के कैटलॉग और तस्वीरें लगी हुई थी।
साली जी वही देख रही थी, और मैं मना रहा था की भगवान करे
ये बस रिवर राफ्टिंग तक ही सीमित रहें, लेकिन वे बंजी जम्पिंग वाले कैटलॉग पर आकर रुक गई।
'बंजी जम्पिंग' भी करना है। उन्होंने कहा तो मेरे पसीने छूट गए।
साली साहिबा की जिद के चलते आखिरकार उनके साथ हमे भी उस चोटिल अवस्था मे रिवर राफ्टिंग के लिये तैयार होना पड़ा।  साले जी ने पहले ही हाथ खड़े कर दिए थे के उनसे न हो पायेगा, और श्रीमती जी का स्वास्थ्य उन्हें इस चीज की इजाजत नही देता था, तो एक एजेंसी द्वारा रिवर राफ्टिंग की बात तय हुई और पेमेंट कर दी गई।
 साले जी और उनकी बहन अर्थात श्रीमती जी ने हमारी अनुपस्थिति में लक्ष्मण झूला एवं राम झूला 
घुमने की योजना बनाई। मुझे और साली जी को राफ्टिंग में लगभग ढाई घण्टे लगने थे, वे बंजी 
जम्पिंग करने के लिये भी तैयार थी।
अब उन्हें मैं अपनी जिम्मेदारी पर लाया था तो उन्हें अकेले नही जाने दे सकता था, 
इसलिए उनके हर एडवेंचर में मेरा साथ रहना आवश्यक ही था। रिवर राफ्टिंग तक सही था 
लेकिन बंजी जम्पिंग का मूड देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए।
मैंने बहाने मारने आरम्भ कर दिए, यार 3500 ले रहे एक आदमी का बंजी जम्पिंग के लिये, 
ये तो पैसों का वेस्टेज है।
3500 भी दो और और पहाड़ से उल्टे लटक कर भी कूदो, यह कहां तक सही है?
वे बोली पहले राफ्टिंग करते है फिर तय करेंगे। तो हम राफ्टिंग के लिये एजेंसी द्वारा दी गई 
जिप्सी में निकल लिए, हमारा राफ्टिंग पॉइंट हमारे होटल से 16 किमी दूर था। इसी बीच जिप्सी 
में केवल महिलाएं ही दिखाई देने लगी, तब पता चला ये हमारी टीम में है। यानी इस राफ्टिंग में केवल एक 
मैं पुरुष सदस्य था। गाइड को यदि न गिना जाये तो।
कुछ देर बाद हम राफ्टिंग पॉइंट पर पहुंचे, हमारे समक्ष साफ स्वच्छ गंगा की लहरें थी, 
इतना स्वच्छ पानी वह भी बहती नदी का , मैंने और साली जी ने पहली बार ही देखा था।
तब तक जिप्सी पर से राफ्ट उतार दी गई, और हमे लाइफ जैकेट्स और हेलमेट्स पहना दीये गये। 
हमने वहां यादगार के लिये कुछ तस्वीरें खींची। 
गाइड ने हमे राफ्ट और पैडल के प्रयोग के विषय मे जानकारी प्रदान की और कुछ आवश्यक निर्देश भी दिए,
 जिसके अनुसार पूरी राफ्ट की जिम्मेदारी हमारी थी। हमे ही चलाना था और हमे ही गंतव्य तक पहुंचाना भी था। 
जब गाइड ने कहा के सबसे आगे वाले व्यक्ति पर सम्पूर्ण राफ्ट की जिम्मेदारी होगी और वही प्रमुख चालक होगा,
 तब मुझे पता चला के गाइड सबसे पीछे बैठ कर बस निर्देश देगा। अब तक मैं समझ रहा था राफ्ट वही चालएगा, 
तो मैंने ठान लिया के मैं तो मध्य में बैठूंगा।
लेकिन उस टीम में बस महिलाएं ही थी, केवल गाइड और मैं ही पुरुष थे, जिसमे से गाइड भाई 
पहले ही सबसे पीछे बैठने की बात कहके खिसक लिए। गाइड ने कहा की आप सबमे से सबसे मजबूत 
और प्रबल सदस्य आगे बैठ जाये।
तो सबकी सब महिलाओं ने एक साथ मेरी ओर ही देखा। एक ने तो कह भी दिया, आप ही
 सबसे मजबूत और पहलवान टाइप हो, हमारी जिम्मेदारी अब आपके ऊपर है।
मैंने सोचा के कहां फंस गया, एक तो यार मैं राफ्टिंग के लिये भी साली जी के कारण जबरदस्ती आया, 
और आया भी तो अब मुझे ही लीडर शिप करनी थी। 
साली जी ने छेड़ा भी, और बनो हीरो हाफ टी शर्ट पहन कर।
तभी मेरे सामने एक राफ्ट लहरों के मध्य कई फ़ीट तक उछली, जिसे देख कर हम सबकी ऊपर 
की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई।
साली जी ने कहा आप फिक्र ना करो, मैं आपके साथ आगे बैठती हु। तब थोड़ी हिम्मत आई और हमने हाई
 फाइव किया और हर हर गंगे कहकर राफ्ट में बताए निर्देशानुसार बैठ गए। धीरे धीरे हमारी राफ्ट किनारे से
 हट कर अब सीधे गंगा मैया की गोद मे थी। 
पानी तो अत्यधिक ठंडा था, और राफ्ट शुरू होते ही भारी लहरों के मध्य इस प्रकार हिचकोले खाई के
 एक संपूर्ण लहर राफ्ट के मध्य प्रवेश करके हम सबको पूर्णतया भिगो कर चली गई।
पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई, इसी प्रकार और भी अनेक लहरों से टकराकर राफ्ट आगे बढ़ी।
मैं अपनी पूरी शक्ति से पैडल चलाता था, किन्तु मेरी टीम की महिलाएं इस मामले में फिसड्डी साबित हुई, जब तक मैं चार बार चप्पू चला लेता तब तक उनका एक राउंड भी ठीक से नही हो पाता था।
हमारी राफ्ट इस बिगड़े तालमेल के कारण घूमने लगी। तब गाइड जी ने महिलाओं को एक लय से पैडल चलाने के निर्देश दिए, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
अब हुआ यह के पूर्ण शक्ति से पैडल चलाने के कारण मेरे कंधे दुखने लगे, पीछे वाली टीम से कोई सहायता प्राप्त नही हो रही थी, बस केवल साली जी थी जो पूरी शक्ति लगा रही थी, जिनकी वजह से मैं राफ्ट को दिशा देने में सफल हो रहा था।
शीघ्र ही मैं थक कर चूर हो गया। 
और उसी पल गाइड ने चप्पू रोकने के निर्देश दिए, अब हम सब शांत बैठे थे।
गंगा अब एकदम शांत थी, पहाड़ और जंगलों के मध्य इस निर्मल और स्वच्छ प्रवाह में बहना एक दिव्य अनुभूति सी थी। बीच बीच मे लहरों के कारण ठंडे जल की बूंदे हमे अवश्य भिगो जाती। गाइड ने इसी मध्य हमे बताया की जिसे पानी के मध्य कूदना हो वे राफ्ट की साइड में लगी रस्सियों को थाम कर कूद सकते है।
मैं तो कतई राजी नही था, लेकिन ग्रूप की दो एक लड़कियों ने इच्छा जताई और कूद गई। ये वही थी जो एक चप्पू चलाने में हांफ जाती थी और कूदने की बारी आई तो फौरन कूद गई।
साली जी ने भी पूछा मैं भी कुदू? जैसे मेरे कहने पर वे रुक ही जाती। मैंने हा कह दिया तो वे कूद पड़ी।
अब मुझे भी कूदना ही था, तो महादेव और गंगा मैया का नाम लेकर मैं भी कूद पड़ा।
कूदते ही मानो सीने से नीचे सम्पूर्ण शरीर एकदम से सुन्न हो गया। पानी अत्यधिक ठंडा था, जिस कारण निचला शरीर पूर्ण रूप से सुन्न सा होता प्रतीत हुआ। लेकिन यह मात्र कुछ सेकंड्स तक रहा, धीरे धीरे उस तापमान का आदि होने के बाद हमने खुद को राफ्ट के हवाले कर दिया। 
अब पानी मे छाती तक डुबे हम गंगा में बह रहे थे, मैं आंखे बंद कर इस अनुभव को समेट रहा था, शुरू में भले डर लगा लेकिन अब इसमें आनन्द आने लगा था। 
मन ही मन साली साहिबा को धन्यवाद दिया की उनकी जिद के ही कारण सही किन्तु कम से कम यह अनुभूति प्राप्त करने का अवसर तो मिला।
काफी देर तैरते रहने के पश्चात गाइड ने हमे पुनः राफ्ट में खींच लिया, अब भीतर का डर पूर्णतया गायब हो चुका था।
लहरे तेज होने लगी थी, राफ्ट उछलने लगी। लेकिन अब लहरों का डर खत्म हो गया था, और हमारे चप्पू तेज चलने लगे, कहने की बात नही के इसमे केवल मैं और मेरी पार्टनर ही सबसे अधिक मेहनत कर रहे थे। 
एक जगह आकर पुनः कूदने को कहा गया, साली जी पुनः कूद पड़ी लेकिन अब मेरी कूदने की इच्छा नही थी, मैं बस कुछ क्षण उस प्रवाह में शांत रहना चाहता था। कुछ देर पश्चात लक्ष्मण झूला दिखने लगा, अब हम निर्धारित तट की ओर बढ़ रहे थे।
राफ्टिंग समाप्त हो चुकी थी, करीब डेढ़ पौने दो घण्टे की राफ्टिंग वाकई में एक जबरदस्त और अद्भुत अनुभव था।
मैं यह भी भूल गया था की अभी एक दिन पहले तुंगनाथ ट्रैक के दौरान मेरी दोनो कलाइयां मुड़ चुकी थी।
ट्रैकिंग की पूरी थकान अब उतर चुकी थी।
इसी बीच साले जी का फोन आया, वे राम झूला घूम चुके थे मैंने आधे घण्टे में आने का आश्वासन दिया और जिप्सी में बैठ गया। 
कुछ ही देर में हम होटल में थे, जहां हमने कपड़े बदले और श्रीमती जी और साले साहब की प्रतीक्षा करने लगे।
हरिद्वार, हर की पौड़ी में
यह बात अच्छी हुई के साली साहिबा बंजी जम्पिंग के विषय मे एकदम से भूल ही गई, और मैं तो याद दिलाने वाला ही नही था।

वे लगभग आधे घण्टे में आये, तब योजना बनी की पहले लक्ष्मण झूला चलते है, कुछ खाते है और सीधे हरिद्वार चलते है, हर की पौड़ी पर गंगा आरती देखनी है।
हम अब लक्ष्मण झूला पर थे, सामने ही 13 मंजिला मंदिर था जो हमेशा तस्वीरों एवं फिल्मो में देखता आ रहा था। लेकिन कल की ट्रैकिंग और ट्रेवलिंग के बाद इतनी शक्ति नही थी की 13 मंजिला मंदिर चढ़ सके तो वही घाट पर घूमने के पश्चात हमने एक होटल में कुछ खाया। 
खाना तो वाहियात ही था, आधा मूड वही खराब हो गया। मुम्बई से निकलने के पश्चात बस चोपता में ही सही खाना मिला था, बाकी जगह तो काम चलाऊ कह सकते है।
खैर अब समय हो रहा था, 5 बज रहे थे और हमे जल्द से जल्द हरिद्वार पहुंचना था, ऋषिकेश के ऑटो वाले भी लूटने के मामले में हरिद्वार वालो से पीछे नही थे। 
हमे कोई 1000 कहता तो कोई 800, हमने कहा भाई आप जो किराया है वह लो, हम रिजर्व नही कर रहे पूरी ऑटो। आप और सवारी भी लीजिये। वे नया जानकर बेवकूफ बनाने का प्रयास करते रहे, लेकिन हम बेवकूफ तो थे नही।
आखिरकार होटल के थोड़ा आगे एक ऑटो स्टैंड था जहा से हर की पौड़ी रेगुलर जाती थी, वहां बात किये तो 400 कहने लगा, हमने कहा प्रति व्यक्ति किराया लेना है तो लो वरना जाने दो।
वरना आरती तो हम परमार्थ आश्रम की ही देख लेंगे।
आखिरकार ऑटो वाले ने मानक किराया बोला 60 रुपये प्रति व्यक्ति, जो कि 50 रुपये प्रति व्यक्ति होता है। ऑटो के भीतर किराए की सूची लगी हुई थी जहां हर की पौड़ी का किराया खुरच दिया गया था। लेकिन अब समय नही था तो हम बैठ गए, तकरीबन पौने या एक घण्टे के बाद हम हर की पौड़ी पहुंच चुके थे। हम गंगा घाट पर पहुंचे, मैंने श्रीमती जी, साली जी और साले जी को निर्देश दिए की घाट पर किसी प्रकार के कर्मकांड में ना पड़े। और ना ही किसी पंडे वगैरह के चक्कर मे पड़ें।
एक धागा या एक आरती भी सीधे 500 का चूना लगा सकती है। श्रद्धा मां गंगा में रखो कर्मकांडो में नही।
उन्हें पर्याप्त निर्देश दिए। और वही हुआ, हर कदम पर कोई ना कोई धागा बांधने वाले, आरती दिलवाने वाले, प्रसाद बांटने वाले मिलने लगे, चूंकि हम पहले ही सावधान थे इसलिये किसी के चक्कर मे नही पड़ें।
यहां आकर पता चला आरती समाप्त हो चुकी है, थोड़ी निराशा हुई लेकिन फिर यह सोचकर रह गया की आरती वगैरह तो बहाना है, असली श्रद्धा और भावना तो माँ गंगा का यह प्रवाह और इसका सानिध्य है, हम घाट पर काफी देर बैठे रहे। 
थोड़ा अफसोस अवश्य था लेकिन गंगा की शीतल लहरों ने जल्द ही सब भुला दिया। 
इसी मध्य श्रीमती जी की इच्छा हुई गंगा में दीप एवं फूल प्रवाहित करने की।
मैंने उन्हें समझाया माँ गंगा को इन सबकी आवश्यकता नही है, उसे स्वच्छ रखो यही पर्याप्त है, फूल पत्तियां दीये बहाकर हम उसे क्यो गंदा करें ? जो गंगा हमे हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग से इतनी सुंदर और स्वच्छ दिखती है, वह बनारस और प्रयागराज आकर इतनी मैली क्यो दिखती है, यही सब छोटे छोटे कर्मकांड वगैरह ही है जो उसे अस्वच्छ बनाते है, और यहां विभिन्न बोर्ड्स पर लिखा भी है, गंगा को स्वच्छ रखे वही उसकी सच्ची पूजा है। तो यही मान लो। 
फिर भी मैंने एक बार उनका मन रखने के लिये दिये लाने का विचार किया तो उन्होंने ही मना कर दिया।
काफी देर बैठने के पश्चात हमने मुख्य सड़क से अपने होटल की ओर एक ऑटो की और हरिद्वार से निकल लिये।
अगले दिन प्रातः हरिद्वार से दिल्ली के लिये ट्रेन थी तो ज्यादा।समय नही था, माँ गंगे से जब भी अवसर मिलेगा पुनः भेंट देने का निश्चय लेकर हमने विदा ली।
उसके बाद हम 3 दिन दिल्ली रहे, लेकिन हमारे जेहन में बस चोपता-तुंगनाथ-हरिद्वार-ऋषिकेश और उत्तराखंड के पहाड़ और ठंडी हंवाये ही थी। अब मुम्बई पहुंच चुका हूं,लेकिन अब भी महसूस होता है मानो मेरा कुछ हिस्सा वही छूट गया है।
भगवान महादेव और माँ गंगा को धन्यवाद देना चाहूंगा जिनके आशीर्वाद के कारण एक साल से अनेक बार बनते बिगड़ते मेरी यह योजना अंततः सफल हुई, इस योजना को सफल बनाने में मेरी श्रीमती जी, मेरी बच्ची अर्थात मेरी ट्रैकिंग और एडवेंचर पार्टनर साली जी, और साले जी का भरपूर योगदान है। 
अनेकों छोटे मोटे झगड़ो, मनमुटावों के बावजूद आखिरकार हम सब एक साथ थे।
एक साथ हमने अनेक अविस्मरणीय अनुभव किये। इस यात्रा ने कभी न मिट सकने वाली एक अमिट छाप हमारे मन मस्तिष्क में छोड़ दी। और हमारे रिश्तों में संबंधों में और अधिक प्रगाढ़ता और अपनापन बढ़ाया। ईश्वर हमारा साथ यू ही बनाये रखे जिससे हमें जल्द ही पुनः नई योजनाओं पर साथ कार्यरत होने का अवसर प्राप्त हो। साल का इससे बेहतर अंत नही हो सकता था मेरे लिए।

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

तुंगनाथ चोपता यात्रा-3


इस यात्रा वृतांत के पिछले भाग पढने के लिए तुंगनाथ-चोपता यात्रा भाग 1 और तुंगनाथ चोपता यात्रा भाग-2 पर क्लिक करें
 गिरते पड़ते आखिरकार तुंगनाथ महादेव के मंदिर तक पहुंच ही गया, शाम होने को थी और ऋषि
केश भी वापस पहुंचना था,ऊपर से भारी थकान और बर्फ से ढंकी चोटियों के कारण तुंगनाथ से आगे डेढ़ किलोमीटर चंद्रशिला जाना लगभग असंभव ही था। इस यात्रा और ट्रैक में मेरी सबसे ज्यादा मददगार बनी मेरी साली जी, यदि वे ना होती तो मैं पहुंचता जरूर किन्तु वापसी बेहद दुष्कर हो जाती। 
तुंगनाथ के कपाट इस समय बंद रहते है, जो मैं पहले से जानता था, किन्तु बंद कपाट श्रद्धा के समक्ष कोई मायने नही रखते, मेरा मानना है कपाट बंद होने से महादेव का आभास हट नही जाता। महादेव तो सदैव आसपास ही है। यहां आने का एक कारण बर्फ भी थी, मुझे,श्रीमती जी, और साली जी को बर्फ की सफेद चादरें देखने की तीव्र इच्छा थी। हमने कभी अपने समक्ष इस वातवारण को महसूस नही किया था, यही कारण था के हमने दिसम्बर की योजना बनाई जब बर्फ वृष्टि अपने उफान पर होती है। और कहना ना होगा के हम अपने उद्देश्य में कामयाब भी रहें। अब तो इतनी बर्फ देख चुके थे के मन सूखी जमीन देखने के लिये बेचैन सा हो उठा। 
मंदिर प्रांगण से निकलते समय मुझे ज्ञात हुआ के मेरी लाठी कही गुम हो गई है, वहां बैठे कुछ लड़कों में से एक ने अपनी लाठी मुझे देनी चाही जिसे मैंने नम्रता से अस्वीकार कर दिया। साली जी ने कहा की ले लीजिए आगे बहुत काम आएगी, आपके जूते साथ नही दे रहे, उनके आग्रह के कारण और उस लड़के के पुनः अनुरोध पर मैंने वह लाठी ले ली। यहां एक बात बताना जरूरी समझता हूं, यदि आपके पास ट्रैकिंग स्टिक्स का जुगाड़ नही है तो लाठियां अवश्य लें, आपको आते हुए भले कोई खास सहायता ना मिले लेकिन लाठी का महत्व आपको जाते हुए अवश्य समझ मे आएगा। निस्संदेह ट्रैकिंग के मध्य रास्ते मे पहुंचकर मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हु के जिस लड़के ने मुझे अपनी लाठी दी थी, वह अपने उस निर्णय पर बेहद पछताया होगा। खैर अब बारी थी वापसी की, और तुंगनाथ की सीढ़ियों से उतरते ही मैं धम्म से गिरा। साली जी हंसी, मैं भी हंसते हुए उठा और उनके साथ हो लिया, उनके ट्रैकिंग शूज बर्फ में पकड़ बनाये चल रहे थे और मैंने ट्रैकिंग पथ के बजाय उसके किनारों पर जमी भुरभुरी बर्फ में चलना उचित समझा। पथ पर बर्फ कड़ी हो जाती है जिससे भयंकर फिसलन होती है, लेकिन किनारों पर भुरभुरी बर्फ होने से पैर धँसते है जिससे गिरने का खतरा कम हो जाता है, लेकिन यहां आपको ध्यान देना होता है क्योंकि इससे आपको आगे किसी खन्दक,गड्ढे या नाली के होने का भी आभास नही होता, जिससे आप खुद को चोट पहुंचा सकते है। ऐसे में लाठी काम आती है, जिसे आगे धंसा कर बर्फ ना केवल बर्फ की गहराई जांची जा सकती है, बल्कि
विपरीत बल देकर अनावश्यक फिसलन से भी खुद को बचाया जा सकता है।
 

थोड़ा आगे जाकर साली जी भी फिसल कर गिरी, और अब हंसने की बारी मेरी थी, हमने हंसी मजाक में प्रतियोगिता शुरू कर दी के नीचे उतरने तक देखते है कौन कितनी बार गिरता है। जो सबसे कम गिरेगा वह विजेता कहलायेगा, उन्होंने मान लिया। और गिनती आरंभ हो गई।
कभी वे गिरती कभी मैं, 15 बार गिरने के बाद मैं गिनती गिनना ही भूल गया, प्रतियोगिता की बात ही छोड़ो। फिर कितनी बार गिरे इसकी गिनती ही नही रही। एक जगह कठोर बर्फ थी, मैंने वहां लगी रेलिंग पर मजबूत पकड़ बनाई और आगे बढ़ने को हुआ ही था के पैर फिसल गए, लेकिन रेलिंग नही छूटी, परिणाम स्वरूप मेरे भार से कलाई ही मूड गई। अत्यधिक दर्द शुरू हो गया, साली जी भी चिंतित दिखाई देने लगी तो कह दिया सब सामान्य है। किसी प्रकार गिरते पड़ते हमने आधा मार्ग पार किया, एक जगह हमे हमारा शार्ट कट दिखा जो आते समय हमने पकड़ा था, साली साहिबा ने शार्ट कट पकड़ने की इच्छा जताई। मैंने एक नजर ट्रैकिंग पाथ को देखा जो लगभग तीन मोड़ लिए हुए काफी लंबा रास्ता था, और फिसलन भी। 
मैं बुरी तरह पस्त था, अनेक बार गिर चुका था, कलाई मुड़ी हुई थी तो मैं और अधिक फिसलने का जोखिम नही उठा सकता था। मैंने उनके शार्ट कट वाले सुझाव पर हामी भर दी और उनके पीछे चल दिया। 
वह रास्ता सीधा उतार था, और डेढ़ फीट से भी ज्यादा बर्फ वहां बिछी पड़ी थी। और यह रास्ता चुनकर हमने गलती कर दी।
जमी हुई बर्फ पर आपको अंदाजा रहता है की रास्ते मे पैर नही धँसेगे लेकिन इस बर्फ में आपको मार्ग के उतार चढ़ाव का कोई अंदाजा नही रहता, आपके कदम रखते ही भुरभुरी बर्फ अंदर तक धंस जाती है और आप फिसल जाते है। मैं यहां भी कई बार गिरा, साली जी के ट्रैकिंग शूज भी यहां बेकार साबित हो रहे थे। फिर भी वे मेरे लिये सही मार्ग बनाते आगे बढ़ रही थी और मुझे उनके ही पदचिन्हों पर आने का आग्रह कर रही थी।
लेकिन एक जगह मेरा पैर फिसला और मैं लुढ़कते हुए उनसे आ टकराया और उन्हें भी कई फीट तक लिए चला गया। 
अब समझ मे नही आ रहा था की हम इस स्थिति पर हंसे या रोये, साली जी तो हताश होकर बैठी ही रह गई। हम शार्टकट के चक्कर मे ऐसे मोड़ पर आ खड़े हो गए थे जहां से ना आगे बढ़ पा रहे थे और ना पीछे जा सकते थे। 
ट्रैकिंग पाथ दिखाई दे रहा था लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए हमे इस मोटी बर्फ की
चादर को पार करना था, बर्फ में पैर धंसा कर चलने से अधिक ऊर्जा खर्च होती है और थकान जल्दी आती है ऊपर से हम हर दो-तीन मिनट में एक बार गिरते जरूर थे, साली जी फिर भी कम गिरती थी लेकिन मेरे स्पोर्ट्स शूज के कारण मैं इतनी बार गिरा के मानो सम्पूर्ण ऊर्जा ही नष्ट हो गई थी। एक एक कदम भारी हो रहा था।

हम बिना बोले कुछ देर तक उसी बर्फ में धंसे हुए बैठे रहे, और अपनी हांफती साँसों को नियंत्रित करते रहे। यहां साली जी को ध्यान आया के मेरी मुड़ी कलाई के कारण मुझे ट्रैकिंग में हद से ज्यादा असुविधा हो रही है । तो जहां मुझे उनका सहारा बनना चाहिए था वहां वे मेरा सहारा बन गई। 
उनके चेहरे पर थकान और हताशा के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। वे उठी और कहा की बस थोड़ी देर और फिर हम मुख्य पथ पर होंगे। उन्होंने हाथ पकड़ कर मुझे किसी प्रकार उस बर्फ की दलदल से निकाला और अथक प्रयास और अनेकों बार गिरने के पश्चात हम आखिरकार मुख्य ट्रैकिंग पाथ पर थे, हम आधा रास्ता पार कर चुके थे, शार्ट कट जितना जाते समय उपयोगी था उससे कई गुना ज्यादा आते समय खतरनाक और जोखिमभरा हो जाता है।
इसलिए अब हमने दूसरा शार्ट कट लेने की योजना एकदम खारिज कर दी और सीधे पाथ पर चल पड़े। अचानक से मैं पुनः एक बार फिसला,लेकिन इस बार भुरभरी बर्फ के बजाय ठोस धरातल पर गिरा, अपने आप को बचाने के चक्कर मे मैंने हाथ सीध में जमीन पर रखा,लेकिन सम्पूर्ण शरीर का भार उसपर आ जाने के कारण मेरी वह कलाई भी मुड़ गई।
इस प्रकार मैंने अपनी दोनो कलाइयों का सत्यानाश करवा लिया और रास्ता अभी भी आधा बाकी था, मेरे कपड़े अंदर तक बर्फ से भीग चुके थे, जूते, मोजे,दस्ताने पूर्णतया गीले हो चुके थे,जीन्स भी लगभग गीली थी जिस कारण ठंड अब ज्यादा महसूस होने लगी थी। अब किसी भी हाल में कैम्प तक पहुंचना ही था। साली जी को जब मेरी दूसरी कलाई के विषय मे पता चला और मेरे भीगे कपड़ो को देखा तो बस किसी तरह उनकी रुलाई उन्होंने रोक ली। 
वे जानती थी की इस समय ऐसी किसी हरकत से दूसरे का मनोबल टूट जाता है। वे नीचे पहुंच चुकी थी मेरे लिए खड़ी थी, वे रास्ते का निर्देश दे रहीं थी की यहाँ से आइए,वहां कदम रखिये। मैं किसी प्रकार टूटी फूटी कलाइयों,भीगे कपड़ो और थकान भरे शरीर को धकेलते हुए उन तक पहुंचा तो उन्होंने हिम्मत बढाने के लिए मेरे कंधे और पीठ थपथपाई।
'बस और थोड़ा रह गया है, चलो मैं हु आपके साथ, बस थोड़ा और हिम्मत दिखाइये।' उनके शब्दो मे उनकी थकान और विवशता स्पष्ट झलक रही थी।

मुझे समझ ना आ रहा था, जहां मुझे उनकी हिम्मत बनना था वहां वे मेरी हिम्मत बढ़ा रही थी। एक बारगी तो दोनो साथ फिसलकर बैठे ही रह गए, तब उन्होंने खुद को ट्रैक पर फिसलाना शुरू कर दिया, मैंने भी यही किया, जूतों के जोर पर बैठ कर दोनो हाथों से सतह को धकेल कर मैं भी कई मीटर तक फिसलते रहा उनके पीछे पीछे।
इस प्रकार हमने इतनी तकलीफ के बावजूद भी फिसलन का ना केवल आनन्द उठाया बल्कि रास्ता भी आसान किया, लेकिन ये ज्यादा देर नही चल सकता था,क्योकि आप ऐसे फिसलते हुए रास्तों के तीखे कटाव पार नही कर सकते। इससे आप किसी पत्थर से टकरा सकते है, कठोर बर्फ पर पलट सकते है, या सीधे पथ से नीचे गिर सकते है जिससे आप गंभीर रूप से घायल भी हो सकते है। किसी प्रकार हम अब ठीक ठाक मार्ग पर आ चुके थे, वहां एक वृद्ध की दुकान थी जो आते समय दिखी थी। जिसे देखकर हमारे अंदर उत्साह का संचार हुआ, क्योकि अब हम आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे। हमने वहां खुद को आराम दिया और गरमागरम चाय और मैगी खाई।
जिससे काफी राहत मिली। आगे का मार्ग हमने एकदूसरे को थामे हुए ही पार किया। मार्ग में वे सरदार जी भी पस्त से पड़े हुये दिखाई दिए जो शुरू में लाठी घुमा कर डांस करते नजर आए थे। अब बर्फीला ट्रैक खत्म हो रहा था, कठोर सतह दिखाई देने लगी थी, जंगलों के मध्य मोनाल पक्षी दिखाई देने लगे तो मैंने साली जी को दिखाया, वे उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर मानो थकान ही भूल गई। मैंने उन्हें बताया के यह उत्तराखंड का प्रमुख पक्षी है। और वहां एक नही बल्कि चार पांच मोनाल दिखे।
उन्हें देखने के बाद अब तुंगनाथ का द्वार दिखाई देने लगा जहां से हमने चढ़ाई आरम्भ की थी। लेकिन एक डर यह भी था की सड़क पर बर्फ जमी होने के कारण हमें फिर से तीन किलोमीटर बर्फ में चलकर ना जाना पड़े। 
अब इतनी शक्ति ना उनमे बची थी और ना मुझमे। तो वही एक लोकल दुकानदार से गाड़ी की बात की, 300 रुपये से बात शुरू होकर आखिर वे 200 में माने, हमारा कैम्प वहां से बामुश्किल तीन साढ़े तीन किलोमीटर ही था लेकिन अब चलने की शक्ति शेष नही थी। हम गाड़ी में बैठे, दोनो ने तुंगनाथ महादेव के द्वार की ओर अंतिम बार देखा और अपने कैम्प की ओर बढ़ गए। 
कैम्प पहुंचने के पश्चात मैंने श्रीमती जी को कैम्प के बाहर हमारी प्रतीक्षा करते हुए पाया, शाम के साढ़े 5 बज रहे थे और अंधेरा होना आरम्भ हो गया था, तापमान में हद से ज्यादा गिरावट यानी शुरू हो गई थी। साली जी ने अपनी बहन को देखा और दौड़कर उनके पास जाकर गले लग गई। वे एकदम से रोने लगी। मैं भी उनके मध्य शामिल हो गया। मैं रोया नही बस काफी देर तक तीनो एकदूसरे से आलिंगनबद्ध रहे। यह काफी भावुक क्षण था। थोड़ी देर पश्चात वे सामान्य हुई तो हमने फटाफट पैकिंग वगैरह की, कपड़े बदले और कैम्प वाले मेजबान को खाने के लिए कह दिया, वे आज रात्रि रुकने का आग्रह करते रहे लेकिन हमें ऋषिकेश हर हाल में पहुंचना ही था तो हम ने सविनय उनके आग्रह को ठुकरा दिया और खाना वगैरह खाकर चेक आउट किया, ठंड इतनी अधिक बढ़ चुकी थी के एक कदम रखना तक दूभर हो रहा था, ड्राइवर ने भी कह दिया के आगे चेकपोस्ट पर गाड़ी रोक देंगे। देवप्रयाग से आगे नही जा पाएंगे, आठ बजे के बाद ट्रेवलिंग वाली गाड़ियां प्रतिबंधित रहती है। हमने कह दिया जहां रोकेंगे वही रात के लिये होटल कर लेंगे लेकिन फिलहाल यहां से निकलिये।



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