सोमवार, 21 जुलाई 2014

जागरूकता या फूहड़ता ?

'यूट्यूब ' और शोशल साईट्स पर इस महीने कोई ''किसिंग प्रैंक ' 
विडिओ और 'गर्ल्स आस्क फॉर कॉन्डमस ' नाम के वीडियोज हिट हो रहे है ! 
और इसके जरिये बताया जा रहा है के ये युवाओं में सेक्स और खुलेपन के 
प्रति जागरूकता फैला रहा है ! ....
एक वीडियो में लडकी आते जाते लोगो से पूछ रही है ' कॉन्डम कहा मिलेंगे ?
 कौन सी क्वालिटी का अच्छा रहेगा ? इत्यादि '
और इस सवाल पर लोगो के रिएक्शन्स देखकर कहा जा रहा है के अभी भी पर्याप्त जागरूकता
 नहीं है लोगो में सेक्स और कॉन्डम के इस्तेमाल के प्रति !
ये आखिर साबित क्या करना चाहते है ? क्या देश में इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा सिर्फ कॉन्डम का 
इस्तेमाल कैसे करे ही रह गया है ? इन्हें इतनी सी बात समझ में नहीं आती के 'सेक्स ' जैसी
 चीज किसी को सिखने की जरुरत नहीं होती बल्कि जानते सब है किन्तु उसकी चर्चा यदि 
आप खुले में करे तो यह असभ्यता कहलाएगी ! 
आप परदे के पीछे की निजी चीजो को सार्वजनिक करके पब्लिक का रेस्पोंस देख रही है ? 
यदि इतनी ही शिक्षा एवं जागरूकता की परवाह है तो शुरुवात घर से कीजिये ! 
घरवालो को जागरूक कीजिये पहले ,अपने पिता से जाकर पूछिए 'कौन सा कॉन्डम सही रहेगा '
माँ से पूछिए ''कॉन्डम कहा मिलेगा ''
बेटी बहन भाई को ज्ञान दीजिये '' कॉन्डम कैसे इस्तेमाल करे का ''
पता नहीं क्यों ऐसा लगता है मानो इनके लिए युवाओ की प्राथमिकता 
इस वक्त सिर्फ 'सेक्स ' ही नजर आती है ! 
आप रिएक्शन देखना चाहती है न !!!!! सरेराह किसी भी आते जाते व्यक्ति से 'कॉन्डम कहा मिलेगा ' 
जैसा मूर्खतापूर्ण सवाल पूछकर आप साबित क्या करना चाहती है ? 
ऐसे तो कोई वेश्या भी नहीं पूछती होगी किसी से !
हद है यार मोडर्न होना मात्र 'शरिरित चंचलता ,सेक्स , 
खुलेआम फूहडपन ही रह गया है ''
एक और आए दिन बलात्कार जैसी घृणित घटनाओं में वृद्धि हो रही है और दूसरी 
और इन्हें ' कॉन्डम कहा मिलेंगे ? जैसा सवाल ही अधिक महत्वपूर्ण दिखता है .
इस वीडियो में जब लडकी ने एक बन्दे से कंडोम के बारे में पुछा तो उस बन्दे ने नहले पे दहला मारा
 और उसे कहा 'कंडोम ? एक मिनट रुकिए ' और उसने जेब टटोली और एक पैकेट निकल कर उसके हाथ में ही दे दिया !
 लडकी भी झेंप गयी एक पल को ..लेकिन यही पर विडिओ एडिट हो गया और इस दृश्य को ज्यादा फूटेज नहीं मिली !

रविवार, 20 जुलाई 2014

कॉमिक्स ट्रेंड एवं दीवाने फैन्स -भाग 2 ( मेरा कॉमिक्स प्रेम भाग =2 )

पिछली पोस्ट में चर्चा हुयी थी मेरे पसंदीदा कॉमिक्स चरित्र 'डोगा ' से मेरी पहली मुलाक़ात की
! इस पोस्ट में जिक्र होगा मेरी अपने हीरो ‘सुपर कमांडो ध्रुव ‘ से पहली मुलाक़ात का .

तब मुश्किल से चौदह पन्द्रह साल का रहा होऊंगा ( ठीक से याद नहीं ),
मै अपनी माँ के साथ अस्पताल गया हुवा था ,कुछ रूटीन चेक अप के लिए ,रास्ते में आते समय सडक के किनारे 
एक पुस्तक की स्टाल पर नजर पड़ी ,जहा रंगबिरंगी और आकर्षक मुखपृष्ठ वाली पुस्तके रखी हुयी थी !
जिसे देखकर मन ललचाया ,मैंने माँ से जिद की ‘आई मुझे यह किताब ले दो न ‘
 ( ‘’माँ ‘ को मराठी में आई ही कहते है ) माँ ने मना किया ,लेकिन मेरे दो बार कहने पर ले दिया .
मै ख़ुशी से उछल ही पड़ा और किताबो के ढेर के सामने खड़ा हो गया ,और मैंने उपर रखी हुयी किताब झट से उठा ली ,
उसका नाम था ‘विडिओ विलेन ‘ ! सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स ,और उसके उठाने के पश्चात मैंने उसके 
निचे और भी कई आकर्षक कॉमिक्स देखि ,लेकिन सोचा माँ गुस्सा करेगी इसलिए एक ही लि ,
मुझे उस वक्त पता नहीं था के वह कैसी कॉमिक्स है ,कौन नायक है ,क्या कहानी है ,
लेकिन कवर पर एक युवक को देखा जो एक गहरी खाई पर एक रस्सी पर खड़ा था और उसके गले में एक फंदा भी कसा हुवा था ,
उसके ठीक सामने ही हाथ में फरसा लिए एक लाल पोशाक में नकाबपोश खड़ा था उसी रस्सी पर !
मैंने उस नकाबपोश और उस युवक को देखकर ही अंदाजा लगा लिया के यह युवक ही नायक है कहानी का !
 नकाबपोश कितना क्रूर लग रहा है ,और उसके गले में फंदा भी नहीं पड़ा है और हाथ में हथियार भी है ! 
इसका मतलब यह बुरा व्यक्ति है , वह कवर तो आप सभी फैन्स जानते है किसने बनाया था
 लीजेंडरी आर्टिस्ट स्वर्गीय ‘प्रताप मलिक ‘ जी ने !
मैने घर पहुँचते ही कॉमिक्स उठायी और घर के बाहर चल दिया , 
और हमारे घर से थोड़ी ही दूरी पर एक मैदान था उसके किनारे पर कुछ बड़े बड़े पत्थर थे ,
दो पत्थरो ने एकदूसरे से जुड़कर कुर्सी की शक्ल ले ली थी ,मै वही आराम से अधलेटी अवस्था में कॉमिक्स पढने लगा ,
जब पढनी शुरू की तो बस बस पढ़ते ही गया और खत्म करके ही उठा ,
उस दिन सच में बहुत आनन्द आया ! बालमन प्रसन्न हो गया के मी पास ऐसी पुस्तक है ,
अनुपम सर जी के चित्रों ने मन को मोह लिया था ! और कथानक भी उसी हिसाब से रोमांचक ,
 बस उसके बाद ध्रुव का ऐसा क्रेज जगा के किसी भी तरह से ध्रुव के कॉमिक्स के जुगाड़ में लगा रहने लगा ,
और ध्रुव के चक्कर में नागराज से भेंट हुयी ,फिर डोगा से भेंट हुयी
 ( डोगा से भेंट हुयी उसकी कॉमिक्स ‘खाकी और खद्दर ‘ से ,) 
और हम कॉमिक्स मय होते चले गए ! उस समय तो इंटर नेट से कभी पाला ही नहीं पड़ा था और ना ही क्रेज था ,
टीवी पर भी सैकड़ो चैनल नहीं होते थे ,एक्का दुक्का चैनल उसमे भी हम बचो के मतलब के चुनिन्दा मगर सबसे बेहतरीन कार्यक्रम ,
बस यही हम बच्चो के मनोरंजन के साधन थे ! 
और अब इस मनोरंजन में कॉमिक्स भी जुड़ गयी और ऐसे जुडी के अब तक बरक़रार है ! 
ध्रुव में मुझे जो पसंद आया था वह था उसका बिना किसी सुपर पावर का होना ( बाद में भले ही कुछ मिल गए ) 
और उसकी सीधी सपाट मगर रोमांचक कहानिया ,ध्रुव की हर कॉमिक्स अपनेआप में बेजोड़ थी !
लेकिन जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई थी ,बहुत ज्यादा वह थी ‘मुझे मौत चाहिए ,वू –डू ,रुन्हो का शिकंजा ,उड़नतश्तरी के बंधक ,
( इन कॉमिक्स के बारे में मेरा मानना यह है के यदि कोई नया व्यक्ति भी ध्रुव की यह कॉमिक्स पढ़ ले तो वह ध्रुव का फैन हो जायेगा ) 
ओह्ह नाम गिनवाते गिनवाते मुझे ऐसा लग रहा है के मै शायद ध्रुव की नब्बे प्रतिशत कॉमिक्स का नाम लिख दूंगा ,
इसलिए रहने दीजिये भाई .
इसी बिच मै बड़ा हुवा ,समझदार हुवा और कॉमिक्स का शौक कही पीछे छूट गया !
 तेरह साल हो गए कॉमिक्स की तरफ देखा भी नहीं ,ऐसे में फेसबुक से अपने ग्रुप से जुड़ा 
और फिर से अंदर का बच्चा ललचाया जो नीली –पिली ड्रेस पहनने वाल सीधे बाल काढ़े लडके के कारनामो का दीवाना था ,
 तो मैंने एकाध बिच की कहानिया पढ़ी ,तो देखा ध्रुव की जिन्दगी में आये हुए कुछ बदलावों को ,
तब लगा अरे यह क्या ? इतना सब कुछ कैसे हो गया ?
( ऐसा महसूस हुवा मानो जैसे हम किसी पुराने दोस्त के जीवन में आये अनपेक्षित बदलावों से विचलित हो जाते है ,
वही भावना आई ,उत्सुकता जगी ) 
और फिर वही उत्सुकता के कारण दोबारा कॉमिक्स के पागलपन ने आ घेरा और फिर तेरह साल बाद मै 
अपने बचपन के सच्चे दोस्त से मिला ,जो मेरे साथ साथ बड़ा हुवा .
हम फैन्स का जूनून ही है के हम एक काल्पनिक पात्र को भी अपने जीवन का हिस्सा मानते है 
और उसके सुख दुःख में हँसत रोते है ,
और उसकी कमांडो फ़ोर्स के तर्ज पर हम खुद को कैडेट और ध्रुव को ‘कैप्टेन ‘ कहकर अपना सम्मान व्यक्त करते है .
इसी उपलक्ष्य में हम सभी फैन्स ने वोटिंग के तहत ग्यारह मई और बारह मई को ‘’ध्रुव दिवस ‘’ के रूप में मनाया ! 
यह वोटिंग शोशल साईट फेसबुक के जरिये कई कॉमिक ग्रुप्स पर की गई ! और इसे बहुत बढ़िया प्रतिसाद भी मिला ,
और यह देखकर ख़ुशी हुयी के ‘कैडेट्स ‘ आज भी अपने ‘कैप्टेन ‘ को चाहते है ,हद से ज्यादा .
सैल्यूट कैप्टेन ,!

‪#‎कॉमिक्स_ट्रेंड_फिर_बढाए‬

रविवार, 13 जुलाई 2014

फिल्म एक नजर में : हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया


कलाकार : वरुण धवन ,आलिया भट ,आशुतोष राणा ,सिद्धार्थ शुक्ल ,गौरव पाण्डेय

बॉलिवुड फिल्मो का यही दुर्भाग्य कहा जायेगा के अब कुछ नयी कहानिया बनने के बजाय 
उन्ही पुराने घिसे पिटे ढर्रे को जबरदस्ती यंगस्टर्स की पसंद के नाम पर खिंचा जा रहा है, 
चलाया जा रहा है ! चूँकि फिल्मो को कहानी के लिहाज से कम ,इंटरटेनिंग एवं 
हलकी फुलकी बनाने के प्रयास ज्यादा होते है इसलिए ऐसी फिल्मे अच्छा खासा नाम भी कमा लेती और दाम भी .
निर्माता यदि करण जौहर हो तो सोने पे सुहागा वाली बात हो जाती है ! 
फिल्म की कहानी का सार वही है जो अब तक की सैकड़ो
फिल्मो का सार रहा है ,लड़का लडकी को देखते ही प्यार ,कुछ प्रयासों के बाद लडकी का मान जाना ! 
लडकी की शादी कही और ,लडके का लडकी के पैरेंट्स को इम्प्रेस करने का पुराना फार्मूला ! 
और क्लाईमेक्स में हमेशा की तरह कठोर दिल बाप का हृदय परिवर्तन और भरी शादी तोडकर एक नए अनजान लडके संग अपनी बिटिया का विवाह करवा देना .
बस अब ले देकर यही फार्मुले बचे है ! कुछ नया करने का प्रयास नहीं करना चाहते ,
क्योकि कमाई जारी है ,इन फिल्मो को हाथो हाथ लिया भी जाता है .
अब कहानी का सार बता ही चुका हु किन्तु फिर भी इसके विस्तार पर आते है .
‘हंप्टी शर्मा’ ( वरुण धवन ) एक मस्तमौला युवक है जो पढाई से ज्यादा आवारगी में ध्यान देता है ! 
लडकियों के पीछे लगे रहना उसकी फितरत सी है ( पता नहीं क्यों अमुमन  हर फिल्म में नायक ऐसा ही होता है ) उसका साथ देने के लिए उसके दो मित्र भी है शंटी ,पप्पू जो उसके हर काम में बराबरी का सहयोग देते है ,
इसमें वह बाप भी है जो अपने बेटे की हरकतों से परेशान तो दिखता है लेकिन करता कुछ नहीं है .
चूँकि पढाई तो कुछ की नहीं तो पास करवाने के लिए हर ऐरे गैरे हथकंडे अपनाता है ‘हंप्टी ‘ ! 
इसी सिलसिले में वह प्रोफेसर को बंधक बना लेता है ,लेकिन वहा उसकी भांजी ‘काव्या ‘ 
( आलिया भट ) आकर अपने मामा को बचाती है और ‘हंप्टी ‘ की मदद करके उसे पास भी करवा देती है .
काव्या अम्बाला से दिल्ली अपनी शादी की खरीदारी के लिए आई है ( घरवालो से झगड़ा करके ,
पांच लाख का लहंगा खरीदने )
क्योकि उसकी सहेली गुरप्रीत ने अपनी शादी में ढाई लाख का लहंगा खरीदा है तो 
अब उसकी जिद है के वह पांच लाख का लहंगा पहनेगी ! किन्तु उसके माता पिता एवं भाई इसे फिजूलखर्ची मानते है ,जिस से काव्या अपनी कमाई से खरीदने की जिद करके अपने मामा के यहाँ दिल्ली आ जाती है
 ( माँ बाप को जरा भी फ़िक्र नहीं के बेटी इतने पैसे कहा से लाएगी )
और यहाँ ‘हंप्टी ‘ से मुलाक़ात के बाद ‘हंप्टी ‘ को काव्या से प्यार हो जाता है ! 
और वह उसकी मदद भी करता है ,कुछ घटनाओं के पश्चात दोनों में प्यार हो जाता है और 
शारीरिक सम्बन्ध भी ( जैसा के आजकल का फैशन है ) .
किन्तु काव्या इसके बाद अपनी शादी की बात कहकर अम्बाला निकल जाती है ‘हंप्टी ‘ से विदा लेकर ! 
हंप्टी उसके गम में है और फाईनली उसे अहसास होता है के वह उसके बिना जी नहीं सकता ! 
तो अपने मित्रो के संग जा पहुँचता है काव्या के घर !
जहा उसकी मुलाकात होती है मिस्टर सिंग ( आशुतोष राणा ) जो काव्या के पिता है ! 
सिंग पहली नजर में ही हंप्टी के इरादे भांप जाते है और उनकी पिटाई करवा कर भगा देते है ,
लेकिन हंप्टी फिर आ जाता है ,तब काव्या की जिद से सिंग हंप्टी को एक मौक़ा देते है के काव्या के 
मंगेतर में कोई कमी ढूंढ कर बता दे तो वह राजी ख़ुशी अपनी बेटी की शादी उससे करवा देगा !
तय समय पर ‘अंगद ‘ (सिद्धार्थ शुक्ल ) अपनी होनेवाली दुल्हन के घर लावलश्कर के साथ आता है ( ये रिवाज कब बदलेगा फिल्मो में ) और फिर शुरू होती हंप्टी और उसके दोनों मित्रो की खुराफाते ! 
जिसमे वे सफल होते है या नहीं यही बाकी कहानी है .
बस यही ! तो समीक्षा पढ़कर और फिल्म देखकर यदि आपके मन में दर्जनों फिल्मो के 
नाम घूम जाए तो हैरानी की बात नहीं होगी !
फिल्म में कुछ भी नया नहीं है ! बस एक लाईट फिल्म है , हल्का फुल्का मनोरंजन करती है , 
बाकी कोई शिगूफे छोड़े जाए तारीफ़ में ऐसी कोई बात नहीं है फिल्म में .
हंप्टी के रोल में वरुण धवन ने कोई कमाल नहीं किया ,वो वही करते नजर आये जो अब तक की 
फिल्मो में करते आ रहे है ! वरुण को चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में देखना अभी बाकी है ! 
आलिया ने भी सिर्फ टू स्टेट्स को ही दोहराया है ,लेकिन प्यारी लगती है ,चुलबुला अभिनय ! 
आशुतोष राणा समय के अनुसार कभी सख्त तो कभी नर्म नजर आये है ,
अपनी भूमिका में एकदम जंचे है ( हिरोपंती के प्रकाश राज याद आ जायेंगे ) 
तो सिद्धार्थ शुक्ला सिर्फ फिल्म की लम्बाई बढाते नजर आये , 
उल्लेखनीय भूमिकाओं में आशुतोष राणा के साथ साथ हंप्टी के मित्रो की भूमिका 
कर रहे गौरव पांडे और साहिल वेध ने जरुर ध्यान खिंचा ! बढ़िया अभिनय ,
तीनो मित्रो की जुगलबंदी के दृश्य हंसाते है ,गुदगुदाते है ! खासकर पीटने के बाद वाले दृश्य में .
संगीत वैसा ही है जैसा आजकल फैशन में है ,
चालु बोल और शोरशराबेवाला ! कुछ गाने जुबान पर है आजकल (
जैसा के हर फिल्म के रिलीज तक होता है ) हिट भी है ( सिर्फ दो हफ्ते या तीन हफ्ते तक ) ,
उल्लेखनीय नहीं है ख़ास .
बस कुछ और देखने का ऑप्शन न हो और मुड बना ही चुके हो तो देख सकते है ! 
नहीं देखे तो भी कोई बात नहीं ,आगे भी ऐसी फिल्मे कतार में मिलेंगी .
हलकी फुलकी मनोरंजक एवरेज फिल्म ! ( पारिवारिक दर्शक दूर ही रहे )
ढाई स्टार

देवेन पाण्डेय 

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

’चलायिब गोली दनादन ‘’ ( व्यंग्य )

भोजपुरी स्टार का भोजपुरी फिल्मो में बढ़ति अश्लीलता विषय में लिया गया इंटर व्यू,
नोट : सभी पात्र एवं घटनाये काल्पनिक है ! उद्देश्य मात्र मनोरंजन है, दिल पे ले हमारी बला से 
तिवारी जी आज बड़े खुश थे ! उभरते पत्रकार थे , और उन्हें अपनी पत्रिका के लिये भोजपुरी सुपरस्टार ‘सन्देश लाल यादव ‘ जिन्हें भोजपुरी फिल्म जगत में ‘बौरहवा ‘’ ( पगला ) नाम से बुलाया जाता था , का इंटरव्यू जो लेना था .
पहुँच गये ‘’चलायिब गोली दनादन ‘’के सेट पर ! एक आईटम डांस फिल्माया जा रहा था , ‘सन्देश हिरोईन के आगे पीछे मटक मटक कार ठुमके लगा रहे थे ! पच्चीस डांसर्स पीछे एक लय में कोरियोग्राफर के इशारे पर नाच रहे थे , कोरियोग्राफर शक्ल से ही छंटा हुवा बदमाश लग रहा था ,
और ‘शाह ‘ जी ने पैक अप कहा ! मौक़ा देख कर ‘तिवारी ‘ जी सन्देश के सामने जा खड़े हुये .
‘’नमस्कार संदेस बाबू ‘’ बत्तिस्सी निपोरते हुये तिवारी मुकुराये
‘’नमस्कार तिवारी जी ! नमस्कार ,आईये बैठिये ‘’ सन्देश ने हाथ जोड़ते हुये कहा और सामने की कुर्सी की ओर इशारा कर दिया .
‘’का लेंगे तिवारी जी ? चाय या काफी , अरे गोली मारिये चाय काफी को ! गर्मी बड़ा जोरो पर है तो ठंडा पीजिएगा ‘’ सन्देश ने मुस्कुराते हुये कहा , सन्देश जो भले ही भोजपुरी का सुपरस्टार था ! लेकिन वह इंटरव्यू की महत्ता से अनजान नहीं था ,इंटरव्यू देने का कोई भी मौक़ा हाथ से जाने नहीं देता था ,
चाय ठंडा निपट गया ! और तिवारी जी सीधे जर्नलिजम पर आ गये .
तिवारी : सर्वप्रथम आप हमें  यह बताये के आप अपने नाम के आगे ‘बौरहवा ‘’ क्यों लगाते है ?
सन्देश : भक्क !!! हम थोड़े ही लगाते है .यह तो जनता का प्यार है जो हमें इस नाम से पुकारती है ,
आपको शुरुवात से सब बताना पड़ेगा , दरअसल बात यह है के हम बचपन में थोड़े ‘बौरहे ‘ थे ( पागल टाईप ) पढाई लिखाई में मन नहीं लगता था ! सनीमा के दीवाने थे हम , बहुत देखते थे ,बीच बीच में गाव में दिवाली –दशहरे –होली के मौको पर नौटंकी लगती थी ! हम आसपास के आठ गाव तक चले जाते थे नौटंकी देखने के चक्कर में ,बिरहा ,बेलवरिया के दीवाने थे ( लोकगायकी का एक प्रकार ) धीरे धीरे हमने लोकगायको की नकल करनी शुरू कर दी , और हम अपने दोस्तों के बीच भी ढोलक हारमोनियम लेके बैठ जाया करते थे , लोगो की प्रशंशा में मिलने लगी तो हम और ‘बौरहे ‘ होने लगे ! आसपास के लाग हमें ‘बौरहवा ‘ के नाम से पुकारने लगे ,तभी गाव में होली के मौके पर एक नौटंकी आई और हमने किसी तरह जोड़ तोड़ करके उसमे शामिल हो गये सौ रुपईया मिले थे ,अब हमने नाच के भी दिखाया तो एक्कावन रुपईया और मिला !
हम तो खुश हो गये ,ईसी बीच यह बात बाबूजी के संज्ञान में आई ,और उस शाम हमें बेंत से मार पड़ी ! बाबूजी सख्त खिलाफ थे के हम ‘नचनिया ‘ बने ! बाबूजी नाचगाने वालो को यही कहा करते थे .
बस हमने समझ लिया के अब अपना यहाँ ठिकाना नहीं है कौनो ,तो हम उसी दल के साथ भाग लिये ,उसके बाद कई शहरों में शो हुये और लोगो का अच्छा खासा प्रतिसाद मिला , एक लोकल म्यूजिक कम्पनी ने हमारा कैसेट जारी कर दिया ‘बौरहवा पगलायिल बा ‘’ और इसके बाद हमारी डिमांड बढ़ी तो बाबूजी ने हमें फिर अपना लिया .
तिवारी : भोजपुरी फिल्मो में बढती अश्लीलता के बारे में क्या कहना चाहेंगे ?
सन्देश : हम बहुत चिंतित है ईस बात को लेकर ,अफ़सोस होता है के कुछ लोग खाली पैसा बनावे खातिर आपन संस्कृति के गिरवी रख रहिल बानी ! माफ़ करी मेरा कहने का अर्थ यह था के कुछ लाग सिर्फ पैसा कमाने के खातिर और सस्ती लोकप्रियता पाने के लिये अपनी संस्कृति का बंटाधार कर रहे है .
तिवारी : किन्तु सन्देश जी ,आपकी शुरवाती अल्बम्स और नौटंकी भी काफी अश्लील और द्विअर्थी हुवा करती थी ,
सन्देश ( झेंपते हुये और बनावटी हंसी हस्ते हुये ) हाहाहा तिवारी जी लागत है रवुआ ( आप ) पूरी छानबीन करके आईल बानी .
तिवारी : अब पत्रकार है तो इतना तो करना ही पड़ता है ! और आप भोजपुरी में क्यों बाते कर रहे है ?
सन्देश : हम भोजपुरी जो ठहरे , आपन भाषा पे गर्व है हमका .
तिवारी : क्षमा कीजियेगा सन्देश जी किन्तु आप तो जौनपुर से बिलांग करते है ! और वहा तो ‘भोजपुरी ‘ नहीं अवधि बोली जाती है अधिकतर , भोजपुरी तो बिहार के ‘भोजपुर ‘ गाव से शुरू हुयी थी .
सन्देश : हीहीही ( खिसियानी हंसी ) तिवारी जी समझा कीजिये ! हमारी फिल्मे भोजपुरी है तो हमें कहना पड़ता है यह सब ,वैसे भी भोजपुरी तो हर जगह देखि जाती है उत्तर प्रदेश हो या बिहार या मध्य प्रदेश और अब तो बम्बई (मुंबई ) में भी देखि जाती है .
तिवारी : अच्छा जाने दीजिये ईस बात को , हम भोजपुरी सिनेमा के गिरते स्तर पर आते है .
सन्देश : हां यह बात काफी जरुरी है ! इसके लिये हमें कहानियों पर ध्यान देना होगा , फिल्मे शशक्त माध्यम है समाज में सन्देश देने का तो हमें ऐसी सार्थक फिल्मे बनानी चाहिए ,बेवजह की अश्लीलता के खिलाफ हमें एकजुट होना पड़ेगा .
तिवारी : वह तो ठीक है सन्देश जी किन्तु अभी अभी आप आईटम सांग फिल्मा कर आ रहे है ! भोजपुरी आईटम क्वीन कहे जाने वाली ‘दुर्भावना ‘ जी के साथ ,और उनके कोस्ट्युम भी काफी अश्लील लग रहे थे ,गानों के बीच उनका नृत्य भी काफी अश्लील लग रहा था ,और आप कह रहे है के आप बेवजह की अश्लीलता के खिलाफ है ?
सन्देश : ( सकपकाया हुवा ) : तिवारी जी ,हमने कहा था हम बेवजह की अश्लीलता के खिलाफ , और हम कुछ सार्थक फिल्म बनाना चाहते है ,यहाँ पर यह गीत ईस कहानी का हिस्सा है ! लड़की की बिदाई हुयी है तो आईटम सांग रखवा दिया है .
तिवारी : (परेशान होते हुये ) : बेटी की बिदाई में आईटम सांग ? सन्देश जी यहाँ तो बिदाई का गीत होना चाहिये सन्देश : हां वह भी है , ईस गीत के बाद ‘बिटिया तोहार जाने से अंगना में आईल बहार ‘’ अर्ररर क्षमा कीजियेगा ‘अंगना भईल उजाड़ ‘
तिवारी : किन्तु आईटम सांग का तर्क नहीं समझ में आया ?
सन्देश : हम समझावत है ! देखिये अट्ठारह साल तक माई बाप ने बिटिया को पाला है उनके जिगर का टुकड़ा है वह ,अब उसकी बिदाई के समय माई –बाप की आँखों में पानी है और बिटियावाले दुखी है ! लेकिन बिटिया के भाई को अपने घरवालो और गाववालो का दुःख देखा नहीं जाता इसलिये उसने उन का मन बहलावे खातिर पहले से ही आईटम सांग का परोगराम बना रखा है ! समझे ? भाई का प्यार है यह जो अपने माँ बाप और गाववालो को दुखी नहीं देख सकता इसलिये यह गीत जरुरी है ,इससे सबका मन बहलता है .
तिवारी : किन्तु यह अश्लील नृत्य हावभाव ? द्विअर्थी शब्द ? इनका क्या तर्क है ?
सन्देश : तिवारी जी कौन दुनिया में पड़े हो आप ? अरे भईया हमरे भारत में आजकल अच्छे गाने पर किसका मन बहलता है ? गाने में थोड़ी सी उत्तेजना जरुरी है ,हम अश्लीलता के खिलाफ है इसलिये गाने को कलात्मक ढंग से फिल्माया है अब इसमें अश्लील का है ?
तिवारी : गाने का शीर्षक ‘पलंगतोड़ बलमा ‘’ है ! क्या यह अश्लील नहीं है ?
सन्देश : तिवारी जी ज़रा सा ह्यूमर भी जरुरी है ! यह एक अर्थपूर्ण गाना है , इसमें एक औरत है जो चूल्हे के लिये लकडिया ना होने से परेशान है ! बरसात का माहौल है तो लकड़ी कहा से आये ? तो वह अपने बलमा से कह रही है ‘पलंगतोड़ बलमा ‘ ताकि वह पलंग की लकडियो से चुल्हा जलाये ! आपने गौर नहीं किया ईस गाने में हमने भारत की गरीबी को दिखाने की कोशिश भी की है के कैसे गरीब व्यक्ति एक वक्त का खाना पकाने के लिये जद्दोजहद करता है ! अब आगरा इसमें अश्लील लगे तो अश्लील यह गाना नहीं सोचने वाले का दिमाग है ! आपको समझ में आया न के गाना कलात्मक है .
तिवारी : ( अपने बाल नोचने की मुद्रा में ) ज ..ज..जी हम समझ गये गाना बिलकुल अश्लील नहीं है ,हमने सूना है आपकी फिल्मो में महिला पात्रो की कोई अहमियत नहीं होती ? पुरुषप्रधान फिल्मे होती है आपकी जिसमे हिरोईन का कार्य सिर्फ नायक का दिल बहलाने और उसके आगे पीछे नाचने भर का होता है .
सन्देश : कैसी बाते कर रहे है तिवारी जी ? हमारी फिल्मे महिलाप्रधान होती है ,अब इसी फिल्म को देखिये नायक के साथ में चार –चार नायिकाये है तो हुयी ना फिल्म महिलाप्रधान ! वैसे भी इसमें ‘ग्राम प्रधान ‘ की भूमिका में भी एक महिला ही है तो आप कैसे कह सकते है के हमारी फिल्मे महिलाप्रधान नहीं होती ?
तिवारी : ( हैरानी से मुह खुला का खुला है ) : च ..चार नायिकाये ? सही है जी ! लगता है हम ही गलत थे
क्रमश ....
तिवारी : जाने दीजिये संदेस जी ! हम दुसरा सवाल पूछते है,क्या आपको नहीं लगता के भोजपुरी फिल्मो में एक बड़े बदलाव की जरुरत है ? अक्सर देखा गया है के भोजपुरी निर्माता अक्सर अपनी फिल्मो को बॉक्स ऑफिस पर कामयाब बनाने के लिये उसकी क्वालिटी से समझौता कर लेते है और असामायिक विषयों पर फिल्मे बना कर उत्तर भारतीय समाज को अँधेरे में रख रहे है जो के सर्वथा गलत है .
सन्देश : नहीं ऐसा नहीं है!  हम आपके कहने पूर्ण रूप से सहमत नहीं है ,हां कुछ लोग है जो अपने फायदे के लिये ऐसा करते है किन्तु सभी नहीं ,बदलाव के पक्षधर हम भी है , और हम भी चाहते है के भोजपुरी फिल्मो का विषय बदला जाये .
तिवारी : किन्तु संदेस जी , आप भोजपुरी फिल्मो के शीर्षक का ही उदाहरण ले लीजिये , इनके शीर्षक कभी भी ‘बलमा ,गोरिया ,ओढनिया ,सजनिया ,देवरवा ,ससुरवा ,साली ,जीजा के आगे नहीं बध पाते ,औउर नाम भी ऐसे होते है जैसे एक पूरा वाक्य कह दिया गया हो ‘’गोरिया मिलय अयबू अबके बजार के ‘’ या ‘ससुरवा बड़ा सतावेला ‘’या फिर ‘दहेज़ में चाहि तमंचा ‘’ क्या हम कभी कोई सार्थक शीर्षक वाली फिल्मे नहीं बना सकते ?
सन्देश : तिवारी आपने उदाहरण में जिन फिल्मो के नाम लिये उनमे से ‘गोरिया मिलय अयबू अबके बजार में ‘ और ‘दहेज़ में चाहि तमंचा ‘ तो हमारी ही फिल्मे है ,और आपको कैसे लगा के यह नाम सार्थक नहीं है ? ‘गोरिया ...फिलिम में नायक अपनी आधी जिन्दगी गुजार देता है नायिका से अपने प्रेम का इजहार करने में और जब हिम्मत कहके वह कह देता है तो लड़की मान जाती है तब मिलने के लिये किसी उपयुक्त जगह की तलाश में नायक कहता है ‘’ गोरिया मिलय अयबू अब के बजार में ‘ अर्थात ‘हे गोरी अबके मिलने आना अगले बाजार में ‘ अब यही ईस फिल्म का केंद्र है तो ईस पर नाम रखना सार्थक कैसे नहीं हुवा ?
और रही ‘ दहेज़ में चाहि तमंचा ‘ वाली बात तो नायक जो है बचपन से कमजोर है डरपोक है, तो वह चाहता है के वह मजबूत बने ! माँ बाप की ह्त्या के बाद और बहन की इज्जत लूटने के बाद वह बदल जाता है तो वह एक साजिश रचकर खलनायक की लड़की को अपने जाल में फंसाता है, और उस से शादी कर लेता है , उसके ससुर को यह नहीं पता के यह वही लडका है जिसे उसने बर्बाद किया था ! लेकिन जब वह लडके को पूछता है के दहेज़ में क्या चाहिये तब लड़का कहता है ‘’ दहेज़ में चाहि तमंचा ‘’ सब सकते में आ जाते है यह सुनकर और तब लड़का उसी तमंचे से खलनायक को मौत के घाट उतार देता है .तो आप बताईये नाम सार्थक है के नहीं है ?
तिवारी ( सन्देश को ऐसी नजरो से देख रहे है मानो वो कोई संत पुरुष हो ) : किन्तु सन्देश जी एक प्रश्न यह है के बाप को मारने के बावजूद नायिका हीरो के साथ कैसे खुश रह सकती है ?
सन्देश : क्योकि वह लडका उसका प्यार था ! और बाप काफी जुल्मी था उसकी शादी एक विधायक के बेटे से करवाना चाहता था, जब उसे अपने बाप की असलियत पता चली और नायक के ऊपर हुये जुल्मो की दास्तान सुनी तो उसे अपने बाप से नफरत हो गई .
तिवारी : लेकिन सन्देश जी हर फिल्म में नायक की बहन का काम सिर्फ ‘बलात्कार ‘ तक ही क्यों होता है ? और हमेशा बहन ही क्यों शिकार बनती है ? और नायक को हमेशा अनाथ दिखाना क्यों जरुरी है ? काहे को हर बार पूरी फैमिली खत्म करवानी जरुरी है ?
सन्देश : देखिये तिवारी जी ! हमारा  समाज काफी भावुक है उसे आक्रोश चाहिये खलनायक के खिलाफ तो खलनायक के इन जुल्मो का शिकार नायक से वे जुड़ाव महसूस करते है, तो हमें यह सब दिखाना पड़ता है .
तिवारी : किन्तु बहन के साथ जब ऐसी घटना होती है तो उसे इतनी डिटेल में दिखाने की क्या जरुरत है ? सुना है सेंसर ने काफी कैंची चलाई थी ईस दृश्य पर तब जाकर यह दृश्य इतना उत्तेजक बना था .
सन्देश : आप गलत शब्द इस्तेमाल कर रहे है तिवारी जी यह उत्तेजक नहीं ‘भयावह ‘ था ! एक त्रासदी थी जिसे हम त्रासदी के रूप में दिखाना चाहते थे ताकि दर्शक ‘बलात्कार ‘ की भयावहता समझे , एक नारी की तकलीफ समझे ! अगर देखनेवाले इसे गलत नजरिये से देखते है तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं है .
तिवारी : संदेस जी , आपकी फिल्मो में ‘बौरहवा ‘ अर्थात आप हमेशा एक गरीब आम देहाती नवयुवक का प्रतिनिधित्व करते है ! आप किसी फिल्म में रिक्शावाले है तो किसी में तांगा वाले ,किसी में मिल मजदुर तो किसी में विद्यार्थी तो हमें यह बताये के एक रिक्शावाला जो दिन भर में बामुश्किल से अपनी रोजी रोटी कमाता है वह भला ब्रांडेड जींस ,जैकेट और ब्रांडेड शूस कैसे अफोर्ड करता होगा ? आपकी फिल्मो का नायक गरीब है किन्तु जब तक वह रिक्शा MEमें नहीं बैठता या तांगा नहीं चलाता तब तक कोई उसे रिक्शावाला या तांगावाला नहीं कह सकता ! वह तो किस रईस बाप की बिगड़ी हुयी औलाद ज्यादा लगता है ,मैंने आजतक ऐसे रिक्शावाले या तांगेवाले नहीं देखे जो राडो की घड़ी पहनते हो या कीमती जूते जैकेट पहनते हो .
सन्देश : देखिये तिवारी जी ! अब हम हर जगह सच्चाई नहीं दिखा सकते , हमारा समाज पहले से ही परेशान है तो हम उसे कुछ पल देते है ख़ुशी के , अब हम हीरो को एकदम से फटीचर तो नहीं दिखा सकते ना ? आखिर लुक्स भी तो कोई चीज होती है ,हम अपने लुक्स से समझौता नहीं कर सकते ! और क्या रिक्शावाला –तांगावाला यह सब नहीं कर सकता ऐसा कही लिखा तो नहीं है ?
तिवारी : किन्तु जहा तक मैंने आपके शुरवाती अल्बम्स देखे है ! आप उसके वीडियोज में सिर्फ एक बनियान और नाडेवाला कच्छा पहने परफोर्म करते थे ,वही तो आपका ट्रेड मार्क था ! ‘बौरहवा ‘ का नाम उसी से तो प्रसिद्ध हुवा था .
सन्देश : ( झेंपते हुये ) : हां हमने भी अपने भूतकाल में कई गलत फैसले किये है जिसका मुझे अफ़सोस है ! किन्तु वह सब तो बीते हुये कल की बाते है ,आप आज को देखो हमने कैसे खुद में बदलाव किया है ! अब हम सामाजिक मुद्दों पर फिल्मे बना रहे है .
तिवारी : हमने सुना है के लोकगायक ‘’ललुवा ‘’ को भी  अपनी अगली फिल्म ‘’जहर बा के प्यार बा तोहार चुम्मा ‘’ में मौका दे रहे है ?
सन्देश : जी हां बिलकुल सही सुना है आपने ! ‘ललुवा ‘ सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है ,उसकी अभी उम्र ही क्या है ? सोलह –सत्रह साल में उसने अपनी कला के बदौलत नाम कमाया है .
तिवारी : लेकिन संदेस जी , ललुवा भले ही कम उम्र हो किन्तु उसके गाने काफी द्विअर्थी होते है ! उन पर अश्लीलता का भी ठप्पा लगा दिया गया है ,इतनी कम उम्र का लड़का अगर ऐसे गाने गाता है तो हम क्या कह सकते है अपनी युवा पीढ़ी के बारे में के वह ईस से क्या सिख लेगी ?
संदेस : अब आप पक्षपात कर रहे हो तिवारी जी ! सारी दुनिया ‘’ जस्टीन बिबर ‘’ को सुने यह चलता है ,उसकी कम उम्र पर कोई सवाल नहीं करता ,किन्तु यही जब हमारा देसी छोरा ‘ललुवा ‘ करे तो बवाल ? मानसिकता बदलनी चाहिये ,अगर कोई आगे बढ़ रहा है तो बढ़ने दीजिये ना काहे को टंगरिया (पैर ) खिंच रहे है ? हमें कला को बढ़ावा देना चाहिये .
तिवारी : किन्तु पिछले ‘भोजपुरी बडका सितारा ‘’ अवार्ड समारोह में आपने अपनी पहुँच का फायदा उठाते हुये सर्वश्रेष्ट कलाकार का खिताब ‘’ जय किशन ‘’ को ना दिलवाकर खुद के नाम करा लिया ! तो क्या इसमें आपने कलाकार को हतोत्साहित नहीं किया ?
संदेस : यह अफवाह है ! सरासर अफवाह है ,अगर उनमे ‘प्रतिभा ‘ होती तो यह अवार्ड उनके नाम ही होता .
तिवारी : यह आप क्या कह रहे है संदेस जी ? सभी जानते है के ‘जयकिशन ‘ जी फर्श से अर्श तक पहुंचे हुये व्यक्ति है ! यहाँ तक के वे ‘बोलीवूड ‘’ में भी कई फिल्मो में केन्द्रीय भूमिका कर रहे है ,क्या यह उनकी प्रतिभा नहीं है ?
संदेस : ( जल भुन कर ख़ाक होते हुये ) तिवारी जी आप यहाँ हमरा इंटरव्यू लेने आये है के ‘जयकिशन ‘ का ? वैसे भी हमारे पास समय बहुत कम है , अगले गाने की शूटिंग करनी है .
तिवारी : क्या ? अगला गाना ? किन्तु अभी तो शादी वाला आइटम सांग खत्म हुवा है ,इतनी जल्दी दुसरा गाना ?
संदेस : बड़े भोले है आप तिवारी जी ! अरे अभी बिटिया बिदा हुयी है तो बिदाई का गाना नहीं बजेगा का ? फिर ससुराल पहुंचेगी तो ससुराल में भी ख़ुशी का माहौल है तो एक आईटम सांग वहा भी होगा ,
तिवारी ( उकता गया है ) : हां हां क्यों नहीं ! आखिर अब भोजपुरी फिल्मे सार्थक जो बनने लगी है , चलिये संदेस जी आप भी जल्दी में है ! तो यह इंटरव्यू यही खत्म करते है ,
( सन्देश तिवारी के पास आता है और उसका रिकोर्डर बंद करता है , और मुस्कुराते हुये उसके कंधो पर हाथ रखता है )
‘’तिवारी जी ! आप अपने आदमी हो ,शुरू से हमें जानते हो तो आपसे क्या छिपाना ?
अंदर की बात बताता हु ! यह सार्थक –वार्थक फिल्मे कुछ नहीं होती , समाज बिगड़े या सुधरे ईस से किसी को कोई मतलब नहीं होता ,हर शुक्रवार को फिल्मे परदे पर आती है ! किसी बदलाव के लिये या संदेस देने के लिये नहीं आती सिर्फ पैसा कमाने आती है , और आप भोजपुरी फिल्मो में बढती अश्लीलता की बात करते है तो हम बता दे के भोजपुरी फिल्मो के निर्माता अधिकतर ऐसे व्यक्ति है जिनका भोजपुरी से कोई लेना देना नहीं है ! वे भोजपुरी भाषा की क ख ग भी नहीं जानते , वे यहाँ समाज सुधारने नहीं आये है वे सिर्फ पैसा बनाने आये है ,
हम भी मजबूर है ! आखिर हम क्या थे ? लोकगायक ,जो तमाशो में नौटंकी में बिरहा –नाच किया करते थे ,जब हमें पैसा कमाने का मौक़ा मिला तो हम क्यों छोड़ेंगे ? समाज बदलना तो नेताओं का काम है ,हम सिर्फ पैसा कमा रहे है ,हम भी एक फिल्म बना रहे है ,हमने भी सोचा के हम कोई सार्थक फिल्म बनायेंगे ! लेकिन हमने सार्थक फिल्मो का इतिहास भी देखा है , हम अपनी कमाई हुई जमापूंजी किसी समाज को बदलने में नहीं गँवा सकते ! और हमने किसी के पीछे बन्दुक नहीं तानी है के आओ और फिल्म देखो , लोगो को इसमें मजा आता है ? पब्लिक सिर्फ ‘मटकते कमर ‘ और द्विअर्थी संवादों पे मजे लेती है तो इसमें हमारी कोई गलती नहीं ,
तिवारी जी मुस्कुराये
‘संदेस जी , मजा तो खुजली करने में भी आता है ! किन्तु अगर समय रहते ईस मजे को
नजरअंदाज करके इलाज ना किया जाये तो इस खुजली को ‘कोढ़ ‘ बनते देर नहीं लगेगी ,समाज भी उसी राह पर है, खुजली में मजे ले रहा है कोढ़ को नजरअंदाज करके ,जब गलती का अहसास होगा तब तक बिमारी लाईलाज हो चुकी होगी ! चलते है ,आपसे मिलकर ,बाते करके ख़ुशी हुई ,नमस्कार ‘’
‘’आते रहियेगा कभी कभार तिवारी जी ! मिटटी से जुड़े लोग बहुत कम मिलते है आजकल , इंटरव्यू छपते ही सूचित कीजियेगा , तस्वीरे तो आपको मिल ही गई है , अब रऊवा (हमें ) के इजाजत देई ...नमस्कार ‘’

 समाप्त

रविवार, 6 जुलाई 2014

कॉमिक्स ट्रेंड एवं दीवाने फैन्स -भाग 1

कुछ समय पूर्व ‘कॉमिक्स ‘ एक बंद होता कल्चर था ! 
किन्तु तेजी से फैलते शोशल मिडिया के इस युग ने
कई संस्थानों में जान फूंकने का कार्य बखुबी किया है ,जिनमे से एक है ‘कॉमिक्स ‘ 
कोई चाहे जितनी बाते कर ले किन्तु इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता के ‘कॉमिक्स ट्रेंड ‘ 
को बढाने के पीछे ‘शोशल मिडिया ‘ एवं कॉमिक्स फैन्स का बहुत बड़ा योगदान है .
फेसबुक पर ही आधा दर्जन से अधिक कॉमिक्स ग्रुप्स है जिनके सदस्यों की संख्या हजारो में है ! 
पेजेस की गिनती ही नहीं .
ऐसे ग्रुप्स में आये दिन फैन्स अपना उत्साह दिखाते रहते है ! जिस तरह बचपन में नयी कॉमिक्स हाथ में आते ही हम सभी उसे अपने यारो दोस्तों को दिखाने में ख़ुशी पाते उसी प्रकार अब कॉमिक्स ग्रुप पर भी यह दिखाई देता है ,
जब उम्र को पीछे धकेल कर कॉमिक फैन सिर्फ बच्चा बन जाता है और ‘अपने ऑर्डर ‘ किये नए सेट के मिलते ही ‘बावला ‘ हो जाता है और ऑर्डर की तस्वीर शेयर करके सबकी वाहवाही भी लूटता है ! 
और उनकी तस्वीरो पर कमेंट्स एवं लाईक्स बरसते है,'बधाई हो ''बधाई हो 'का ताँता ऐसा लगता है 
मानो कॉमिक सेट का निकलना एवं मिलना भी एक त्यौहार हो गया हो ,
कॉमिक फैन्स के इसी उत्साह को देखते हुए मैंने ग्रुप्स पर चहलकदमी करके उन फैन्स की 
पोस्ट्स का स्नैप यहाँ इस पोस्ट में शेयर किया है जिसमे उन्होंने नए सेट के मिलने पर अपनी 
प्रतिक्रिया दी है ,कॉमिक ग्रुप्स पर कॉमिक ट्रेंड को बढाने के लिए विभिन्न तरह से टास्क ,
प्रतियोगिताये एवं ट्रेंड्स भी होते है जिसका उद्देश केवल कॉमिक ट्रेंड को फैलाना ही है 

तस्वीरे कुछ ग्रुप्स से साभार ली हुयी है , Indian comics universe fan club एवं Indian Comics Fans Junction
कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
आलोक सिंग परमार जी की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
अविनाश तिवारी जी की पोस्ट !

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
दीपक पूनिया 
जी की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
देवेन पाण्डेय ( मै ) की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
फील डी ब्लेंड की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
हीरा लाल भारद्वाज की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
लोकेश गौतम की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
मनोज कुमार की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
मुकेश गुप्ता एवं अमन कुमार जी की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
प्रदीप वर्मा की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
संदीप सिंग की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
शहाब खान की पोस्ट 

कॉमिक्स ट्रेंड फिर बढ़ाये
सुमित सिन्हा की पोस्ट 

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

अबोध मेहमान !


जब इस प्रथम बार हथेली पर उठाया

दिनांक १६ मई २०१४ को मुझे यह मिला। किसी पेड़ से गिर गया था । कव्वे परेशान कर रहे थे।
मेरे छोटे भाई इसे बचाकर घर ले आये । उन पेड़ो के झुरमुट में इसका घर तलाशना संभव नहीं था !
 बहुत ही छोटा सा था जो की अभी उड़ना भी नहीं जानता था ,और बहुत डरा हुवा भी ,
इसलिए इसे खुले में रखना भी उचित नहीं लगा !
इसे बचाकर घर ले आये,!
अब समस्या यह थी के यह अभी उड़ना नहीं जानता और इसे इस हाल में अकेले नहीं छोड़ सकते ।
यह कुछ खा पि भी नहीं रहा था , इस बाबत मैंने अपने फेसबुक प्रोफाईल पर पोस्ट भी की,
और मित्रो की सलाह मांगी!
जब खिलाने के सारे तरीके विफल हो गए तो इसे छत पर ले जाया गया
और कुछ दाने वहा बिखेरे, तब कई चिड़िया वहा दाना चुगने आई । और हैरान करने वाली बात तो यह थी के उन्होंने उस नन्हे चिड़िया को भी अपने मुंह से खाना खिलाया, कुछ देर बाद वे उड़ गयी ।

तब समझ में आया के अब इसे जब तक यह उड़ नहीं जाता रोज इसी तरह छत पर ले जाना होगा ।
क्योकि शायद उसे यही तरीका पता हो खाने का ! उसकी माँ भी तो चोंच में ही भरती होगी ,
तो हमने उसे चावल के दाने उसके समक्ष रखने के बजाय हाथो से खिलाना ही उचित समझा !
और उसे उसकी चोंच के सामने चावल का दाना दिखाते स्पर्श कराते और वह गप्प से
मुंह खोलता और निगल लेता ! अब इस नन्हे मेहमान के घर आ जाने से हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ गई .
हमें घर में एक नवजात शिशु के होने का अनुभव एवं जिम्मेदारी का अनुभव होने लगा .
हमने इसके नजदीक अपना अंगूठा किया और यह नन्हा जिव फुर्र से हमारे हाथ पर आ गया ,
मानो उसने जान लिया हो के उसे मुझसे किसी प्रकार का खतरा नहीं .
प्रथम बार इसने मेरे हाथो से भोजन ग्रहण किया
इसने उड़ने की कोशिश तो दुसरे दिन ही शुरू कर दी थी ,लेकिन वह घर के बाहर नहीं जाता था ,
हां घर के बाहर भी जब निकलता तब हमारे अंगूठे पर ही बैठा रहता,
 और दूसरी चिडियों को देखकर चहचहाता !
यकींन मानिए ,यह इतना मासूम और निरीह था के इसे अपने हाथो में सोता देखकर मुझे उन
लोगो की सोच पर हैरानी होती है जो इन पशु पक्षियों को मात्र स्वाद की वस्तु समझते है !
न इन्हें किसी की जुबान समझ में आती है और न किसी के शब्द ,
लेकिन फिर भी प्यार के अहसास को समझते है .
इसलिए जब से इसे लाया गया था तब से यह इतने आराम से हमारे बेड के सिरहाने सो रहा था ,
मानो इसे हमसे कोई डर ही नहीं है !
मेरी पत्नी जी ने इसे तकिये के बगल में सुलाया था ,किन्तु मैंने सोचा कही रात्रि में अनजाने में करवट लेते समय कुछ हो न जाये इसलिए इसे बेड के नजदीक एक कुर्सी पर एक कार्टन के बॉक्स में कुछ चावल,
और पानी रखकर सुला दिया करता था और वह सोता भी था  .
लेकिन सुबह सुबह ही अपने चहकने से इसने परेशान करना शुरू कर दिया !
अपने बक्से में से कूद कर सारा घर घुमता रहता ,और हम इसके पीछे परेशान रहते की कही
अपना अहित न कर ले.  
उस दिन बालकनी में लेके गया तो दूसरी चिडियो को देखकर फुदक रहा था पंख फडफडा रहा था ।
हमारी सबसे प्यारी तस्वीर
आज खुश लग रहा था । ठीक हो रहा था लेकिन बालकनी में भी मेरी ऊँगली नहीं छोड़ रहा था ,
ऊँगली पर बैठे बैठे ही फुदकने का प्रयत्न कर रहा था  
आखिरकार तीन दिन हमारे घर रहनेवाले इस मेहमान ने अपनी उड़ान भरी और हमें अलविदा कह दिया !
वह तीन दिन दिन सच में बहुत भावनात्मक थे हमारे लिए ,
इसकी देखभाल में वक्त कैसे गुजर गया यह पता ही नहीं चला ,
जब हम इसे छत पर अन्य चिडियों के बिच ले गए तो
जाते जाते वे इसे भी लेते चले गए !
हमें बहुत ख़ुशी हुयी किन्तु थोड़ी तकलीफ भी हुयी !

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