शनिवार, 29 दिसंबर 2018

तुंगनाथ चोपता यात्रा-3


इस यात्रा वृतांत के पिछले भाग पढने के लिए तुंगनाथ-चोपता यात्रा भाग 1 और तुंगनाथ चोपता यात्रा भाग-2 पर क्लिक करें
 गिरते पड़ते आखिरकार तुंगनाथ महादेव के मंदिर तक पहुंच ही गया, शाम होने को थी और ऋषि
केश भी वापस पहुंचना था,ऊपर से भारी थकान और बर्फ से ढंकी चोटियों के कारण तुंगनाथ से आगे डेढ़ किलोमीटर चंद्रशिला जाना लगभग असंभव ही था। इस यात्रा और ट्रैक में मेरी सबसे ज्यादा मददगार बनी मेरी साली जी, यदि वे ना होती तो मैं पहुंचता जरूर किन्तु वापसी बेहद दुष्कर हो जाती। 
तुंगनाथ के कपाट इस समय बंद रहते है, जो मैं पहले से जानता था, किन्तु बंद कपाट श्रद्धा के समक्ष कोई मायने नही रखते, मेरा मानना है कपाट बंद होने से महादेव का आभास हट नही जाता। महादेव तो सदैव आसपास ही है। यहां आने का एक कारण बर्फ भी थी, मुझे,श्रीमती जी, और साली जी को बर्फ की सफेद चादरें देखने की तीव्र इच्छा थी। हमने कभी अपने समक्ष इस वातवारण को महसूस नही किया था, यही कारण था के हमने दिसम्बर की योजना बनाई जब बर्फ वृष्टि अपने उफान पर होती है। और कहना ना होगा के हम अपने उद्देश्य में कामयाब भी रहें। अब तो इतनी बर्फ देख चुके थे के मन सूखी जमीन देखने के लिये बेचैन सा हो उठा। 
मंदिर प्रांगण से निकलते समय मुझे ज्ञात हुआ के मेरी लाठी कही गुम हो गई है, वहां बैठे कुछ लड़कों में से एक ने अपनी लाठी मुझे देनी चाही जिसे मैंने नम्रता से अस्वीकार कर दिया। साली जी ने कहा की ले लीजिए आगे बहुत काम आएगी, आपके जूते साथ नही दे रहे, उनके आग्रह के कारण और उस लड़के के पुनः अनुरोध पर मैंने वह लाठी ले ली। यहां एक बात बताना जरूरी समझता हूं, यदि आपके पास ट्रैकिंग स्टिक्स का जुगाड़ नही है तो लाठियां अवश्य लें, आपको आते हुए भले कोई खास सहायता ना मिले लेकिन लाठी का महत्व आपको जाते हुए अवश्य समझ मे आएगा। निस्संदेह ट्रैकिंग के मध्य रास्ते मे पहुंचकर मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हु के जिस लड़के ने मुझे अपनी लाठी दी थी, वह अपने उस निर्णय पर बेहद पछताया होगा। खैर अब बारी थी वापसी की, और तुंगनाथ की सीढ़ियों से उतरते ही मैं धम्म से गिरा। साली जी हंसी, मैं भी हंसते हुए उठा और उनके साथ हो लिया, उनके ट्रैकिंग शूज बर्फ में पकड़ बनाये चल रहे थे और मैंने ट्रैकिंग पथ के बजाय उसके किनारों पर जमी भुरभुरी बर्फ में चलना उचित समझा। पथ पर बर्फ कड़ी हो जाती है जिससे भयंकर फिसलन होती है, लेकिन किनारों पर भुरभुरी बर्फ होने से पैर धँसते है जिससे गिरने का खतरा कम हो जाता है, लेकिन यहां आपको ध्यान देना होता है क्योंकि इससे आपको आगे किसी खन्दक,गड्ढे या नाली के होने का भी आभास नही होता, जिससे आप खुद को चोट पहुंचा सकते है। ऐसे में लाठी काम आती है, जिसे आगे धंसा कर बर्फ ना केवल बर्फ की गहराई जांची जा सकती है, बल्कि
विपरीत बल देकर अनावश्यक फिसलन से भी खुद को बचाया जा सकता है।
 

थोड़ा आगे जाकर साली जी भी फिसल कर गिरी, और अब हंसने की बारी मेरी थी, हमने हंसी मजाक में प्रतियोगिता शुरू कर दी के नीचे उतरने तक देखते है कौन कितनी बार गिरता है। जो सबसे कम गिरेगा वह विजेता कहलायेगा, उन्होंने मान लिया। और गिनती आरंभ हो गई।
कभी वे गिरती कभी मैं, 15 बार गिरने के बाद मैं गिनती गिनना ही भूल गया, प्रतियोगिता की बात ही छोड़ो। फिर कितनी बार गिरे इसकी गिनती ही नही रही। एक जगह कठोर बर्फ थी, मैंने वहां लगी रेलिंग पर मजबूत पकड़ बनाई और आगे बढ़ने को हुआ ही था के पैर फिसल गए, लेकिन रेलिंग नही छूटी, परिणाम स्वरूप मेरे भार से कलाई ही मूड गई। अत्यधिक दर्द शुरू हो गया, साली जी भी चिंतित दिखाई देने लगी तो कह दिया सब सामान्य है। किसी प्रकार गिरते पड़ते हमने आधा मार्ग पार किया, एक जगह हमे हमारा शार्ट कट दिखा जो आते समय हमने पकड़ा था, साली साहिबा ने शार्ट कट पकड़ने की इच्छा जताई। मैंने एक नजर ट्रैकिंग पाथ को देखा जो लगभग तीन मोड़ लिए हुए काफी लंबा रास्ता था, और फिसलन भी। 
मैं बुरी तरह पस्त था, अनेक बार गिर चुका था, कलाई मुड़ी हुई थी तो मैं और अधिक फिसलने का जोखिम नही उठा सकता था। मैंने उनके शार्ट कट वाले सुझाव पर हामी भर दी और उनके पीछे चल दिया। 
वह रास्ता सीधा उतार था, और डेढ़ फीट से भी ज्यादा बर्फ वहां बिछी पड़ी थी। और यह रास्ता चुनकर हमने गलती कर दी।
जमी हुई बर्फ पर आपको अंदाजा रहता है की रास्ते मे पैर नही धँसेगे लेकिन इस बर्फ में आपको मार्ग के उतार चढ़ाव का कोई अंदाजा नही रहता, आपके कदम रखते ही भुरभुरी बर्फ अंदर तक धंस जाती है और आप फिसल जाते है। मैं यहां भी कई बार गिरा, साली जी के ट्रैकिंग शूज भी यहां बेकार साबित हो रहे थे। फिर भी वे मेरे लिये सही मार्ग बनाते आगे बढ़ रही थी और मुझे उनके ही पदचिन्हों पर आने का आग्रह कर रही थी।
लेकिन एक जगह मेरा पैर फिसला और मैं लुढ़कते हुए उनसे आ टकराया और उन्हें भी कई फीट तक लिए चला गया। 
अब समझ मे नही आ रहा था की हम इस स्थिति पर हंसे या रोये, साली जी तो हताश होकर बैठी ही रह गई। हम शार्टकट के चक्कर मे ऐसे मोड़ पर आ खड़े हो गए थे जहां से ना आगे बढ़ पा रहे थे और ना पीछे जा सकते थे। 
ट्रैकिंग पाथ दिखाई दे रहा था लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए हमे इस मोटी बर्फ की
चादर को पार करना था, बर्फ में पैर धंसा कर चलने से अधिक ऊर्जा खर्च होती है और थकान जल्दी आती है ऊपर से हम हर दो-तीन मिनट में एक बार गिरते जरूर थे, साली जी फिर भी कम गिरती थी लेकिन मेरे स्पोर्ट्स शूज के कारण मैं इतनी बार गिरा के मानो सम्पूर्ण ऊर्जा ही नष्ट हो गई थी। एक एक कदम भारी हो रहा था।

हम बिना बोले कुछ देर तक उसी बर्फ में धंसे हुए बैठे रहे, और अपनी हांफती साँसों को नियंत्रित करते रहे। यहां साली जी को ध्यान आया के मेरी मुड़ी कलाई के कारण मुझे ट्रैकिंग में हद से ज्यादा असुविधा हो रही है । तो जहां मुझे उनका सहारा बनना चाहिए था वहां वे मेरा सहारा बन गई। 
उनके चेहरे पर थकान और हताशा के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। वे उठी और कहा की बस थोड़ी देर और फिर हम मुख्य पथ पर होंगे। उन्होंने हाथ पकड़ कर मुझे किसी प्रकार उस बर्फ की दलदल से निकाला और अथक प्रयास और अनेकों बार गिरने के पश्चात हम आखिरकार मुख्य ट्रैकिंग पाथ पर थे, हम आधा रास्ता पार कर चुके थे, शार्ट कट जितना जाते समय उपयोगी था उससे कई गुना ज्यादा आते समय खतरनाक और जोखिमभरा हो जाता है।
इसलिए अब हमने दूसरा शार्ट कट लेने की योजना एकदम खारिज कर दी और सीधे पाथ पर चल पड़े। अचानक से मैं पुनः एक बार फिसला,लेकिन इस बार भुरभरी बर्फ के बजाय ठोस धरातल पर गिरा, अपने आप को बचाने के चक्कर मे मैंने हाथ सीध में जमीन पर रखा,लेकिन सम्पूर्ण शरीर का भार उसपर आ जाने के कारण मेरी वह कलाई भी मुड़ गई।
इस प्रकार मैंने अपनी दोनो कलाइयों का सत्यानाश करवा लिया और रास्ता अभी भी आधा बाकी था, मेरे कपड़े अंदर तक बर्फ से भीग चुके थे, जूते, मोजे,दस्ताने पूर्णतया गीले हो चुके थे,जीन्स भी लगभग गीली थी जिस कारण ठंड अब ज्यादा महसूस होने लगी थी। अब किसी भी हाल में कैम्प तक पहुंचना ही था। साली जी को जब मेरी दूसरी कलाई के विषय मे पता चला और मेरे भीगे कपड़ो को देखा तो बस किसी तरह उनकी रुलाई उन्होंने रोक ली। 
वे जानती थी की इस समय ऐसी किसी हरकत से दूसरे का मनोबल टूट जाता है। वे नीचे पहुंच चुकी थी मेरे लिए खड़ी थी, वे रास्ते का निर्देश दे रहीं थी की यहाँ से आइए,वहां कदम रखिये। मैं किसी प्रकार टूटी फूटी कलाइयों,भीगे कपड़ो और थकान भरे शरीर को धकेलते हुए उन तक पहुंचा तो उन्होंने हिम्मत बढाने के लिए मेरे कंधे और पीठ थपथपाई।
'बस और थोड़ा रह गया है, चलो मैं हु आपके साथ, बस थोड़ा और हिम्मत दिखाइये।' उनके शब्दो मे उनकी थकान और विवशता स्पष्ट झलक रही थी।

मुझे समझ ना आ रहा था, जहां मुझे उनकी हिम्मत बनना था वहां वे मेरी हिम्मत बढ़ा रही थी। एक बारगी तो दोनो साथ फिसलकर बैठे ही रह गए, तब उन्होंने खुद को ट्रैक पर फिसलाना शुरू कर दिया, मैंने भी यही किया, जूतों के जोर पर बैठ कर दोनो हाथों से सतह को धकेल कर मैं भी कई मीटर तक फिसलते रहा उनके पीछे पीछे।
इस प्रकार हमने इतनी तकलीफ के बावजूद भी फिसलन का ना केवल आनन्द उठाया बल्कि रास्ता भी आसान किया, लेकिन ये ज्यादा देर नही चल सकता था,क्योकि आप ऐसे फिसलते हुए रास्तों के तीखे कटाव पार नही कर सकते। इससे आप किसी पत्थर से टकरा सकते है, कठोर बर्फ पर पलट सकते है, या सीधे पथ से नीचे गिर सकते है जिससे आप गंभीर रूप से घायल भी हो सकते है। किसी प्रकार हम अब ठीक ठाक मार्ग पर आ चुके थे, वहां एक वृद्ध की दुकान थी जो आते समय दिखी थी। जिसे देखकर हमारे अंदर उत्साह का संचार हुआ, क्योकि अब हम आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे। हमने वहां खुद को आराम दिया और गरमागरम चाय और मैगी खाई।
जिससे काफी राहत मिली। आगे का मार्ग हमने एकदूसरे को थामे हुए ही पार किया। मार्ग में वे सरदार जी भी पस्त से पड़े हुये दिखाई दिए जो शुरू में लाठी घुमा कर डांस करते नजर आए थे। अब बर्फीला ट्रैक खत्म हो रहा था, कठोर सतह दिखाई देने लगी थी, जंगलों के मध्य मोनाल पक्षी दिखाई देने लगे तो मैंने साली जी को दिखाया, वे उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर मानो थकान ही भूल गई। मैंने उन्हें बताया के यह उत्तराखंड का प्रमुख पक्षी है। और वहां एक नही बल्कि चार पांच मोनाल दिखे।
उन्हें देखने के बाद अब तुंगनाथ का द्वार दिखाई देने लगा जहां से हमने चढ़ाई आरम्भ की थी। लेकिन एक डर यह भी था की सड़क पर बर्फ जमी होने के कारण हमें फिर से तीन किलोमीटर बर्फ में चलकर ना जाना पड़े। 
अब इतनी शक्ति ना उनमे बची थी और ना मुझमे। तो वही एक लोकल दुकानदार से गाड़ी की बात की, 300 रुपये से बात शुरू होकर आखिर वे 200 में माने, हमारा कैम्प वहां से बामुश्किल तीन साढ़े तीन किलोमीटर ही था लेकिन अब चलने की शक्ति शेष नही थी। हम गाड़ी में बैठे, दोनो ने तुंगनाथ महादेव के द्वार की ओर अंतिम बार देखा और अपने कैम्प की ओर बढ़ गए। 
कैम्प पहुंचने के पश्चात मैंने श्रीमती जी को कैम्प के बाहर हमारी प्रतीक्षा करते हुए पाया, शाम के साढ़े 5 बज रहे थे और अंधेरा होना आरम्भ हो गया था, तापमान में हद से ज्यादा गिरावट यानी शुरू हो गई थी। साली जी ने अपनी बहन को देखा और दौड़कर उनके पास जाकर गले लग गई। वे एकदम से रोने लगी। मैं भी उनके मध्य शामिल हो गया। मैं रोया नही बस काफी देर तक तीनो एकदूसरे से आलिंगनबद्ध रहे। यह काफी भावुक क्षण था। थोड़ी देर पश्चात वे सामान्य हुई तो हमने फटाफट पैकिंग वगैरह की, कपड़े बदले और कैम्प वाले मेजबान को खाने के लिए कह दिया, वे आज रात्रि रुकने का आग्रह करते रहे लेकिन हमें ऋषिकेश हर हाल में पहुंचना ही था तो हम ने सविनय उनके आग्रह को ठुकरा दिया और खाना वगैरह खाकर चेक आउट किया, ठंड इतनी अधिक बढ़ चुकी थी के एक कदम रखना तक दूभर हो रहा था, ड्राइवर ने भी कह दिया के आगे चेकपोस्ट पर गाड़ी रोक देंगे। देवप्रयाग से आगे नही जा पाएंगे, आठ बजे के बाद ट्रेवलिंग वाली गाड़ियां प्रतिबंधित रहती है। हमने कह दिया जहां रोकेंगे वही रात के लिये होटल कर लेंगे लेकिन फिलहाल यहां से निकलिये।



शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

तुंगनाथ चोपता यात्रा - 2


पिछली पोस्ट में मैंने ऋषिकेश से
श्री महादेव तुंगनाथ का मंदिर 
चोपता पहुंचने और मार्ग के रोमांचक अनुभवों के विषय मे

 सविस्तार से बताया था।
जिसे आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते है 
मौसम और माइनस 5 डिग्री ठंड के कारण हमने रात्रि ट्रैकिंग खारिज करके सुबह तुंगनाथ ट्रैक करने की योजना बनाई।
तुंगनाथ मन्दिर के शीर्ष से दिखाई देती वृहद पर्वत श्रृंखला 
 हम कुछ घण्टो पश्चात तुंगनाथ के मुख्य द्वार पर थे, अब यहां से लगभग 3 किमी की ट्रैकिंग थी। हमने मुख्य द्वार पर बैठे अफसरों द्वारा पर्ची कटवाई और अपने पास मौजूद वस्तुओं का ब्यौरा दिया, वैसे हमारे पास बस दो पानी की बोतलें और एक छोटा डिब्बा ड्राई फ्रूट्स का ही था। मैं और मेरी साली जी ने महादेव का जयघोष करते हुए ट्रैक पथ पर कदम रखा।
तुंगनाथ ट्रैकिंग के लिये उस समय अधिक भीड़ नही थी, बमुश्किल दो तीन लोगों का दल ही जाते दिखाई दिया। ट्रैकिंग आरंभ करते ही पथरीले मार्ग पर जमी सख्त बर्फ से सामना हुआ। भुरभुरी बर्फ की तुलना में सख्त बर्फ पर फिसलने का खतरा अधिक होता है, और उस पर चोट लगने का जोखिम भी सबसे अधिक होता है। मैं अनेकों बार अपने स्पोर्ट्स शूज में फिसलते फिसलते बचा, साली जी के ट्रैक शूज के कारण उन्हें पकड़ बनाने में सहायता मिल रही थी, वे बिना लड़खड़ाए चलती रही। थोड़ी दूर चलने के बाद ही आलम यह था के हमारे चारों ओर केवल बर्फ की सफेद चादर ही दिखाई दे रही थी। एक ओर जंगल तो दूसरी ओर बर्फ से ढंकी पर्वतशृंखलाये। एक क्षण तो ऐसा आया के अब तक सुंदर दिखाई देने वाली चीजें ही उकताहट पैदा करने लगी, ऐसा होने के पीछे प्रमुख कारण थकान थी। अब हवा भी भारी होती प्रतीत हो रही थी, सांसे धौंकनी की तरह चलने लगी थी, यहां तक के कुछ फ़ीट के अंतर की दूरी पर चलने वाली साली जी की सांसे तक स्पष्ट सुनाई देने लगी, वे हांफ रही थी। ऐसे ही गिरते पड़ते डेढ़ दो घण्टे बीत गए, फिर हमने लंबे लंबे मोड़ लेते ट्रैकिंग पथ को देखा और निर्णय लिया के हम शार्ट कट लेते है, जो मुड़ कर जाने के बजाय सीधी चढ़ाई थी। हमारे पीछे एक दल आ रहा था जिसमे दो सरदार भी थे। एक दुबला पतला सरदार काफी जोशीला लग रहा था, वह बर्फ से ढंके एक टीले पर चढ़ कर अपनी लाठी घुमा कर डांस भी करने लगा। हमने एक नजर उसकी तरफ देखा, मैंने साली जी से कहा भी की इसका यह जोश बस यही तक है। उतरते वक्त देखते है कितना शेष रहता है, उन्हें वैष्णो देवी यात्रा की अब तक याद थी। वैष्णो देवी जाते समय वे फुर्ती से दौड़ी चली गई थी बिना थकान के। लेकिन आते समय उनकी हालत खराब हो गई थी, आधा पहाड़ मेरे कंधों के सहारे ही उतरी थी। हमने शार्ट कट लिया जहा कड़ी बर्फ के बजाय भुरभुरी बर्फ थी। एक एक फ़ीट तक बर्फ में पैर धँसाते हुए हम आगे बढ़े। मेरे स्पोर्ट शूज में बर्फ जाती स्पष्ट महसूस हुई। मेरे हैंड ग्लव्स जो ऊनि थे वे भी बर्फ से गीले हो रहे थे। हमने यहां एकाध बार स्नो बॉल बना कर एक दूसरे को मारा भी। लेकिन थकान अधिक होने और ठंड के कारण यह खेल भी छोड़ना पड़ा। मैं कई बार बर्फ में पैर धंसने के कारण गिरा लेकिन चोट वगैरह नही आई। सीधी चढ़ाई वाला फिसलन नही था लेकिन अधिक थकाऊ अवश्य था। कई बार साली जी ने ही मुझे सहारा दिया। मैं डील डौल में पहलवानों जैसा हु, वजन में भी 95 किलो का हु। वे दुबली पतली सी वजन में मुझसे आधी ही होंगी, तो मेरी सहायता करना खुद उनके थकान का कारण बनता जा रहा था। जहां तक हो सके मैं उनकी सहायता नजरअंदाज करने का प्रयास करता रहा । इसी प्रकार हमने दो लंबे शार्ट कट्स लिए, जो सीधी चढ़ाई थी। यहां मैंने एक सबक सीखा की यदि आपके पास ट्रैकिंग शूज नही है तो आप शार्ट कट ना ले, सीधी चढ़ाई वाले तो कतई नही। धीरे धीरे मेरी काली जीन्स सफेद बर्फ के निशानों से रंग चुकी थी। साली जी भी कई मर्तबा फिसली और गिरी भी। हम दोनों एक दूसरे को गिरते पड़ते उठाते रहे और चलते रहे। दो शार्ट कट के बाद अब तीसरा शार्ट कट लेने की हिम्मत नही बची थी। हम बीच बीच मे पानी पीते रहे, मैंने उन्हें एक बार मे अधिक पानी पीने के बजाय घूंट घूंट करके थोड़ी थोड़ी देर बाद पानी पीने की सलाह दी जिससे थकान और प्यास जल्दी नही लगती। मार्ग में मुझे यह देखकर कई जगहों पर ट्रैकर्स द्वारा छोड़ा गया कचरे का ढेर देखकर बड़ी ही घृणा हुई के हम इंसान इतनी सुंदर जगहों पर भी अपनी नीचता से बाज नही आते। अनेक जगहों पर तो बियर की खाली कैन्स और बोतलें तक दिखाई दे रही थी। चॉकलेट्स, पानी की खाली बोतलें और स्नैक्स के खाली पैकेट्स तो इफरात में थे। पता नही वो किस मानसिकता के लोग होंगे जिन्हें ऐसी सुंदर जगह पर गंद फैलाते उनकी आत्मा नही धिक्कारती। तुंगनाथ जैसे पंचकेदार पर शराब पीने में भी जिन्हें हिचक नही होती। हमारा मन वितृष्णा से भर गया । मैं रास्ते भर ऐसे लोगो को कोसता चला आ रहा था। खैर ऊपर से हमे नीचे आते कुछ यात्री दिखे जिनकी हालत खस्ता थी, कुछ मोड़ पर करने के पश्चात ही एक जानी पहचानी चोटी देखकर मैं उछल पड़ा। वो चंद्रशिला शिखर था, मैंने साली जी को तुंगनाथ और चंद्रशिला के काफी वीडियोज दिखाए थे आने के पहले, तो वे भी पहचान गई। तुंगनाथ मंदिर परिसर स्पष्ट दिखाई देने लगा था, एक नई शक्ति और ऊर्जा का संचार हुआ। लेकिन थकान फिर भी जस की तस ही थी, हमने एक जगह बैठ कर चारो ओर देखा, यह एकदम स्वर्ग के दृश्य जैसा था, बर्फ की सफेद चोटियां और चारो ओर विशालकाय पहाड़ ही पहाड़, मानो हम दुनिया के सबसे शीर्ष पर आ बैठे हो। केदार और चौखम्बा पर्वत श्रृंखलाओं पर हवा से सफेद बादलों की तरह उड़ता हुआ कुछ दिखाई दे रहा था, हमने ऐसा दृश्य पहले कभी नही देखा था। हम काफी देर तक निहारते रहे और कुछ तस्वीरें भी निकाल ली। फिर हमने थोड़े ड्राई फ्रूट्स खाये और पानी के घूंट लेने के पश्चात आगे बढ़े। एक बोतल खाली हो चुकी थी जिसे मैंने क्रश करके अपनी जैकेट की जेब मे ही ठूंस दिया, वहां फेंकने का प्रश्न ही नही उठता था। अब हम तुंगनाथ की सीढ़ियों पर पहुंच चुके थे, साली जी ने लगभग मेरा हाथ खींचते हुए मुझे सीढ़ियों पर चढ़ाया। मुख्य द्वार पर पहुंच कर मैंने माथा टेका और घण्टी बजाई, अब मैं मंदिर के प्रांगण में था। वहां दूसरे दलों के लोग भी थे, जो फिलहाल सेल्फी और वीडियोज में व्यस्त थे। मुझे इन चीजो का होश नही था। मैं मंदिर के समक्ष जा खड़ा हुआ , कपाट बंद थे जो मुझे पहले से ही ज्ञात था। एक अद्भुत अनुभूति सी हो रही थी वहां, मैं अपने आप मंदिर के समक्ष बैठ गया। साली जी ने भी उस समय मुझे नही टोका। वे मंदिर को चारों ओर से निहार रही थी। मैं बर्फ के ढेर पर काफी देर आंखे बंद किये बैठा रहा। लगभग बीस मिनट शांत बैठे रहने के पश्चात मैंने मंदिर के सामने से दिखाई देने वाले दृश्यों की ओर नजर दौड़ाई। वाकई स्वर्ग को यदि परिभाषित किया जाए तो यह वही दृश्य था, मैं भावुक हो गया था, साली जी मेरे पास आई। वे जानती है के मैं थोड़ा भावुक व्यक्ति हु। मैंने उनको धन्यवाद दिया के उन्होंने एक साल से मेरा तुंगनाथ आने का सपना पूर्ण करने में अपना सहयोग दिया और मेरे साथ यहां तक आई। उन्होंने धन्यवाद के लिए मुझे डांट दिया, की आप ऐसा ना बोला करो। मुझे भी यहां आने का मन था। कुछ देर हम यू ही मंदिर को देखते निहारते रहे। दोपहर के ढाई बजे रहे थे, थकान और मौसम को देखते हुए चंद्रशिला जाना उचित नही था। मेरा मन था लेकिन हमें शाम को ही ऋषिकेश भी निकलना था और चंद्रशिला जाने के बाद यह सम्भव न रहता, दूसरे वे भी थकी हुई थी तो वो असमर्थ थी। तीसरे अभी हमे सबसे कठिन कार्य करना था और वो था उतरना। वैसे भी चंद्रशिला पर जाने का मतलब था वापसी में अंधेरा होना जो के उन रास्तो पर कतई घातक होता। तो हमने महादेव के दर्शन करके ही इति कर ली। चंद्रशिला जाने की योजना निरस्त करने वाले केवल हम ही नही थे, मंदिर परिसर में जितने भी दल थे लगभग सभी चंद्रशिला योजना निरस्त कर चुके थे। मार्ग में बर्फ सूख कर कड़ी होने के कारण फिसलन भी थी जिस वजह से चंद्रशिला का मार्ग थोड़ा अधिक खतरनाक था। तो हमने महादेव के समक्ष माथा टेक कर और यादगार के लिये कुछ फोटोज खींचकर विदा ली और तुंगनाथ से नीचे की ओर यात्रा आरम्भ कर दी, असली कठिनाई तो अब आरम्भ होने वाली थी।


गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

तुंगनाथ चोपता यात्रा - 1

तुंगनाथ प्रवेश द्वार 
बर्फ की सफ़ेद चादरों से ढंका तुंगनाथ मंदिर 
ट्रेकिंग के पहले एक बार जी भर कर नज़रों को कैद करने की इच्छा 



कैम्प परिसर से दिखाई देती केदार पर्वत श्रृंखला 







हमारा शानदार कैम्प 

आखिरकार एक वर्ष की प्रतिक्षा और बनती बिगड़ती अनिश्चित योजनाओं के पश्चात आखिरकार इस दिसम्बर में
चोपता-तुंगनाथ जाने की योजना सफल हुई। मैंने अपने जीवन मे प्रथम ही बर्फ की सफेद चादर देखी थी।
मैंने ऋषिकेश से एक कैब बुक कर रखी थी जिसमे वापसी किराया शामिल था। बस वगैरह की सुविधा थी लेकिन
वो थोड़ा अनिश्चित एवं भागदौड़ भरा पर्याय लगा इसलिये खुद की कैब ज्यादा सुविधाजनक लगी भले पैसे थोड़े
तुंगनाथ ट्रेकिंग से पहले ही मनोरम दृश्य 
ज्यादा खर्च करने पड़े।
ऋषिकेश से चोपता तक का लगभग 200 किमी का अंतर मानो कटने का नाम ही नही ले रहा था,
मैंने अनुमान लगाया था के 50 किमी प्रतिघन्टा भी यदि कैब चली तो भी अधिकतम 5 घण्टो में हम चोपता में रहेंगे,
 लेकिन सारा गणित तब बिगड़ गया जब गाड़ी 30 किमी प्रतिघन्टा के हिसाब से चलने लगी।
ऊपर से चार धाम योजना सड़क निर्माण के कारण जगह जगह कटिंग चल रही थी, जिस कारण हमें
उकीमठ पहुंचने तक ही अच्छी खासी रात हो गई, रास्ते मे जब थकान अधिक हो गई तब एक छोटे से
 होटल में रुक कर गरमागरम चाय और मैगी का नाश्ता किया, मैंने इतना स्वादिष्ट मैगी आज तक नही खाया था,
मन प्रफुल्लित हो गया, इस समय तक हवा में ठंडक भी काफी हो चुकी थी। 
हम पुनः अपनी कैब में सवार हो अपनी मंजिल की ओर चल पड़े, सात घण्टे बीत चुके थे,
कुछ घण्टो बाद हम उकीमठ पहुंचने वाले ही थे के कैब के सामने ही रास्ते के मध्य एक जीव ने छलांग लगाई।
हमारी सांसे तब रुक गई जब उसे गौर से देखा। वह एक बाघ था, बाघ को पिंजरे में और फिल्मों में देखना अलग बात है,
इसके लिए तो शब्द ही नही 
और चलते रस्ते में देखना अलग। हमारी सिट्टी पिट्टी इस शानदार जीव को देखकर गुम हो गई थी,
खैर बाघ को हमसे कोई फर्क नही पड़ता था तो वह चुपचाप सड़क पर करके झाड़ियों में कही गुम हो गया,
तब ड्राइवर ने बताया के यहां बाघ वगैरह सामान्य बात है, चोपता में भी पहाड़ो पर बर्फ जमने के बाद बाघ नीचे उतर आते है,
बाघ तो फिर भी ठीक लेकिन अक्सर भालू सामने पड़ जाता है, इस समय तो होंगे ही।
हमारी सुबह 3 बजे तुंगनाथ और चंद्रशिला ट्रैकिंग की योजना थी लेकिन अब सामने बाघ देखने के बाद हिम्मत
ही नही हुई के अंधेरे में ट्रैक करें, बाघ को इस प्रकार रास्ते के मध्य चहलकदमी करते देख हमारी सांस मानो रुक सी गई,
 वो तो भला हो के श्रीमती जी सो रही थी, उन्हें इसकी भनक तक नही लगी।
केवल मैंने ,ड्राइवर ने और मेरी साली जी ने ही बाघ को देखा। बाघ झाड़ियों में लुप्त हो गया तब ड्राइवर ने
बताया के बाघ यहां सामान्य है, सर्दियों में पहाड़ियों पर बर्फ गिरने से बाघ और भालू जैसे जानवर नीचे आ जाते है,
इसलिए इस समय रात की ट्रैकिंग खतरनाक मानी जाती है। बाघ को इस तरह बेफिक्र घूमता देख और भालू का
 उल्लेख सुनकर साली जी ने फौरन रात्रि ट्रैकिंग की योजना खारिज कर दी।
 हमारी योजनानुसार केवल हम दोनों ही तुंगनाथ और चंद्रशिला की ट्रैकिंग करने वाले थे,
श्रीमती जी का स्वास्थ्य ट्रैकिंग के अनुकूल न होने की वजह से उन्हें कैम्प में ही रुकना था।
उनकी छोटी बहन और मुझमे अच्छी ट्यूनिंग है, और हम थोड़ा फुर्तीले भी है, हमे पिछले वर्ष वैष्णो देवी का
 भी अच्छा खासा अनुभव था। यहाँ बताना चाहूंगा के कही भी जब घूमने की योजना बनती है
तब मैं किसी दोस्त के साथ नही जाता। मैं श्रीमती जी और साली जी, हमारी स्वयं की तीन मेम्बर्स की टीम है
 जो हमेशा नई नई जगहों पर घूमने जाती है और खूब मजे करती है, इसलिए मुझे किसी अन्य मित्र की कभी
आवश्यकता नही पड़ी। एक साल से उत्तराखंड घूमने की योजना बन रखी थी, विभिन्न ट्रैवेल ग्रुप्स से मुझे
चोपता-तुंगनाथ के विषय मे पता चला, मैंने गूगल से चोपता-तुंगनाथ के विषय मे अनेक आलेख,
और जानकारीपूर्ण ब्लॉग पढ़े, यूट्यूब पर वीडियोज भी देखे और मंत्रमुग्ध रह गया के अब यही जाना है,
बाकी जगहें भले ना जाये। इससे पहले ऋषिकेश,हरिद्वार,मसूरी और धनौल्टी की योजना बनी थी।
मसूरी और धनौल्टी केवल स्नो फॉल हेतु जाने की इच्छा थी। किन्तु चोपता-तुंगनाथ के विषय मे पढ़ -देख-सुन
 कर उत्कंठा इतनी बढ़ी की मसूरी और धनौल्टी अपने आप इस योजना से बाहर हो गये।
अब यात्रा का मुख्य उद्देश्य केवल तुंगनाथ रह गया था। खैर हम अब उकीमठ पार कर चुके थे,
कुछ ही देर में हम चोपता पहुंचने वाले थे, रास्ते के दोनों किनारों पर बर्फ की सफेद चादरें दिखाई देने लगी थी।
मैंने श्रीमती जी को जगाया और बर्फ दिखाई, वे किसी बच्चे की भांति किलकारी मार उठी और देखने लगी,
उस अंधेरे में भी केदार,चौखम्बा पर्वतशृंखलाओ की सफेद चोटियां चांद की दूधिया रोशनी में स्पष्ट चमक रही थी।
 वह वाकई बेहद अद्भुत और दिव्य दृश्य था, एक ओर घना जंगल मध्य में संकरा रास्ता,
तुंगनाथ ट्रेकिंग के दौरान विश्राम 
 बर्फ की झिलमिल चादरें, सितारों भरा स्पष्ट आकाश, और दूध से सफेद बर्फाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं,
यह एक परिकथा के परिवेश जैसा था, कुछ कुछ हमे नार्निया जैसी फिल्मों की याद आ गई।
हम तीनों सदैव बकबक करने वाले प्राणी है किंतु वह परिवेश देख कर हम मन्त्रमुग्ध से हो गए थे।
 भावनाएं अपने चरम पर थी, बस आंखों के कोनो में नमी सी महसूस हुई, कुछ ही क्षणों में हम
अपनी मंजिल पर पहुंच चुके थे, कैम्प वाले भाई साहब का लगातार फोन आ रहा था और वे
 हमारे स्वागत के लिये खड़े थे, मैंने कैम्प और चार्जेस के विषय मे एक महीने पहले ही जानकारी
निकाल कर बात तय कर रखी थी। और ज्यादा ना भटकते हुए अपनी बात वही सिमित रखी।
 इसलिए मुझे स्पष्ट पता था के मुझे कहा जाना है, मेरी साली जी हैरान थी के मुझे उन सारी जगहों के विषय
 मे एकदम सटीक जानकारी कैसे थी, उन्होंने कई बार पूछा भी की आप यहां पहले भी आ चुके है?
 मैंने ना में सर हिला दिया अब उन्हें क्या बताता के पिछले दस महीनों से मैं केवल चोपता-चंद्रशिला-तुंगनाथ
 में ही आकंठ डूबा हुआ था। खैर हमारी कैब रुकी और दरवाजा खुला, दरवाजा खोलते ही मेरे दोनो कान
एकदम सुन्न हो गए, उंगलियां मानो जमी हुई बर्फ में चले गए से प्रतीत हो रहे थे।
चोपता में तो कल्पना से भी अधिक ठंड थी। फौरन कंपकंपी आरम्भ हो गई,
हमारे मेजबान ने फौरन जैकेट्स पहनने को कहा, हमारे पास सामान्य गर्म कपड़े थे,
लेकिन इसके बावजूद मैंने करोल बाग से आने के पहले ही सस्ते दामों में कुछ बढ़िया गर्म जैकेट्स खरीद लिए थे,
वे वाकई उपयोगी साबित हुये, दस्ताने और कनटोप भी मैंने सुरक्षा के लिए पहले ही खरीद रखे थे,
अब तक उनका उपयोग नही हुआ था, गाड़ी से बाहर आते ही हमने सबसे पहले दो जैकेट्स पहन,
दस्ताने और कनटोप पहन लिये। बात ही नही हो पा रही थी, और दांत किटकिटा रहे थे। हमारे मेजबान ने
 दूर से दिखाया और मार्गदर्शक बनकर चलने लगे, कैम्प मुख्य सड़क से लगभग हजार कदम की दूरि पर था,
किन्तु यह मामूली दूरी भी इस प्रकार भारी पड़ रही थी मानो हम किसी खड़े पहाड़ पर चढ़ रहे हो,
किसी प्रकार हम कैम्प पहुंचे और अपना बैग वहां पटक दिया।
कैम्प पहुंचते ही कल्पना से भी अधिक ठंड से हमारा सामना हुआ, हमारे मेजबान ने हमे बताया
के इस समय यहां का तापमान माइनस 5 डिग्री है। अविश्वास का प्रश्न ही नही उठता था, सड़क से कुछ
 दूर स्थित कैम्प में पहुंचने तक मार्ग में पड़ते नालियों का पानी तक बर्फ में जमा हुआ दिखाई दिया।
कुछ ही देर में हम कैम्प में थे, मेजबान ने बताया की कुछ दिनों पहले इसी कैम्प में सारा अली खान
रुकी थी जिसमे हम ठहरे थे, खुशनसीबी यह रही के मेरी श्रीमती जी और इनकी सिस्टर को सारा
अली खान के विषय मे कुछ पता नही था। और मुझे तो फर्क ही नही पड़ता था, मैंने मजाक में मेजबान
से कहा भी, के मैं सारा के ठहरने की वजह से कोई एक्सट्रा चार्जेस नही दूंगा, तो वे हंस पड़े।
श्रीमती जी की बहन का सपना था के वे किसी जंगल अथवा हिल स्टेशन पर बोन फायर का आनन्द उठाये,
इस विषय मे उन्होंने गाड़ी में भी चर्चा की थी। तो पहुंचते ही मेजबान ने कुर्सियां रखवा कर लकड़ियां
सुलगाकर अलाव की व्यवस्था करवा दी। वाकई उस गला देने वाली ठंड में अलाव तापने का अपना ही मजा था।
 हम ने जल्दी जल्दी से अपने कपड़े बदले और बाहर कुर्सियों पर बैठ अलाव का मजा लेने लगे। कैम्प बेहद
 खूबसूरत जगह पर था, जहां से केदार पर्वतशृंखलाये इस अंधेरे में भी किसी मोती की भांति चमकती स्पष्ट
 दिखाई दे रही थी। कुछ ही देर में खाना भी लग गया, खाना सादा ही था लेकिन इतने दिन से मुम्बई-दिल्ली-
हरिद्वार-ऋषिकेश के खानों से मन उकता गया था, और यह सादा खाना हमारे लिये किसी लजीज व्यंजन से
कम नही था। मैं कई बार दिल्ली आया हु, कह सकता हु के दिल्ली का खाना बड़ा भारी हो जाता है।
मजे की बात यह हुई के जब भी मेजबान गरमागरम दाल परोसते, कुछ ही क्षणों में वह एकदम ठंडी हो जाती।
 इस समय खाने और मुंह से समान मात्रा में ठंडी भांप निकल रही थी। हमने किसी प्रकार खाना निपटाया और
अलाव के सामने बैठे ढेर सारी बातें की। कल की योजना थी चंद्रशिला से सूर्योदय देखने की,
जो मौसम को देखते हुए अभी भी अनिश्चित ही थी। हमारे कैम्प परिसर में चारो ओर बर्फ फैली हुई थी।
कई जगह बर्फ ठोस हो चुकी थी जिसपर फिसलन भी थी, मेजबान ने बताया इससे कई गुना अधिक
 बर्फ इस समय तुंगनाथ और चंद्रशिला ट्रैक पर है, अंधेरे में ट्रैकिंग इस समय खतरनाक है, दिन में भी
 इस मौसम में जाना कठिन हो जाता है तो रात्रि 3 बजे निकलना बेहद दुष्कर है, ऊपर से जंगली जानवरों
का डर भी इस मौसम में अधिक होता है। साली साहिबा बाघ देखकर पहले ही थोड़ी दहशत में थी तो
उन्होंने स्पष्ट कर दिया के अंधेरे में ट्रैकिंग नही जाना, सुबह उजाला होते ही चलेंगे, बात तार्किक भी थी ,
मैं केवल एडवेंचर करने के चक्कर मे उन्हें जोखिम में नही डाल सकता था। ऊपर से जिस तरह का मौसम
 था उस मौसम में सूर्योदय का मजा भी नही आना था। दूसरे तुंगनाथ का मुख्य द्वार हमारे कैम्प से चार
किमी दूरी पर था, मेजबान ने बताया के तुंगनाथ द्वार तक सड़क पर ठोस बर्फ जमी है, जिस कारण
 फिसलन है और गाड़ियां आगे नही जा पा रही । सुबह जहां तक गाड़ी जाएगी वहां जाएंगे और
बाकी रास्ते पर से ही ट्रैक शुरू हो जाएगी। मैंने हा कर दिया। फिर हम अपने कैम्प में आये, तीन मोटी
 रजाइयों के बावजूद ठंड से ठिठुरते हुए पूरी रात कटी। सुबह लगभग छह बजे मेरी नींद खुली,
मैंने ब्रश करने के लिये नल का पानी चेक किया तो पानी आ ही नही रहा था, मैंने कैम्प के कर्मचारियों
को इस बाबत सूचित किया तो पता चला टँकी में पानी है लेकिन ठंड से जम जाने के कारण नही आ रहा।
फिर उन्होंने 3 बाल्टियां गर्म पानी पहुंचाया । इसके बाद मैं बाहर आया, कैम्प के बाहर की ठंड मानो सुइयां
सी चुभोती प्रतीत हो रही थी। मैंने अपने आसपास के वातावरण का जायजा लिया, रात के अंधेरे में कुछ भी
 स्पष्ट नही दिखाई दिया था, सुबह के उजाले में वह दृश्य किसी परिकथा में दर्शाये वातावरण सा सुंदर लग रहा था,
जंगलों और पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ, पक्षियों का कलरव और दूर स्थित केदार पर्वत श्रृंखलाओं पर पड़ती सूर्य
 की पहली किरण। मैं समझ गया था के अब कुछ ही क्षणों में यह पर्वत चोटियां सूर्य की किरणों से स्वर्ण की
भांति दमकने लगेंगी। मैं दौड़ कर कैम्प में गया और श्रीमती जी को जगाया के बाहर चलो फौरन। वे जाग गई
 किन्तु उनकी बहन सोने के मामले दिलदार है लेकिन मैंने भी उन्हें जबरन जगाया और लगभग खींचते हुये
 कैम्प के बाहर लाया। और उन्हें केदार पर्वत की ओर देखने के लिये कहा। पहले तो वे आधी नींद के कारण
 झुंझलाई किन्तु सामने का दृश्य देखकर अवाक रह गई। सूर्य की किरणों से बर्फ से ढंकी चोटियां सुनहरे रंग
में यू दमक रही थी मानो उनपर किसी ने सोने का पानी चढ़ा दिया हो। ऐसा अद्भुत दृश्य बस तस्वीरों और
इंटरनेट पर ही देखते आये थे। आज हम तीनों उसके सामने खड़े थे। मैं इस खूबसूरत पल को मोबाइल
और फोटोग्राफी के चक्कर मे गंवाना नही चाहता था। हम तीनों एक साथ खड़े होकर हाथों में हाथ डाले
प्रकृति की इस अद्भुत सुंदरता को मन्त्रमुगद्ध होकर निहार रहे थे। ठंडी हवाएं अपने चरम पर थी किन्तु इस
दृश्य का मोह उस पर भारी पड़ रहा था। जी भर कर इस दृश्य को निहारने के पश्चात हमने यादगार के तौर
पर कुछ तस्वीरें खींची। ऋषिकेश से निकलने के पश्चात ही हर पड़ाव पर हम अपने वीडियोज बनाते आ रहे थे,
 ताकि यादें जेहन में हमेशा बनी रहे, तो दो वीडियोज यहां भी बनाकर इन खूबसूरत अप्रतिम मनमोहक
अद्वितीय अद्भुत सुंदर दृश्यों को कैमरे में सदैव के लिए बंदिस्त कर लिया। अब सुबह के 7 बज चुके थे,
हमने ब्रश वगैरह किया। नाश्ता वगैरह बनते बनते 9 बज चुके थे। साढ़े नौ बजे ट्रैकिंग शुरू करनी थी,
हमने गणित लगाया के 3 बजे तक हम वापस आ चुके होंगे और आते ही पुनः ऋषिकेश निकल लेंगे।
और रात दस बजे तक पहुंच जाएंगे। लेकिन जैसा के आरंभ से मेरा हर गणित गड़बड़ाता आ रहा था
 तो यहां भी वही हुआ। ट्रैकिंग आरम्भ करने से पहले ट्रैकिंग शूज की आवश्यकता थी,
मुझे ग्यारह नम्बर के जूते लगते है जो  के मेजबान के पास उपलब्ध नही थे। साली जी के साइज के नए जूते
 मिल गए किन्तु वे उन्हें पहनने में आनाकानी कर रही थी क्योकि वे भारी और सेफ्टी शूज टाइप के थे।
वे अड़ी रही के अपने स्पोर्ट शूज पर ही जाएंगी। मैंने जबरदस्ती उनकी एक न सुनी और उन्हें ट्रैकिंग शूज पहना दिए।
वे अनमने मन ने मुंह बनाये देखती रही, श्रीमती जी ने प्यार से समझाया, मेरे पास कोई पर्याय नही था तो मैं
अपने स्पोर्ट शूज के ही भरोसे था, मैं मौसम को हल्के में ले रहा था जो आगे जाकर मेरी लापरवाही ही साबित हुई।
 खैर श्रीमती जी से विदा लेकर मैं और साली जी ट्रैकिंग के लिये रवाना हो गए, ट्रैकिंग लम्बी होने के कारण दो
बोतलें पानी की और खाने के लिए भारी सामान के बजाय एक डिब्बा ड्राई फ्रूट का ले लिया,
ड्राई फ्रूट मुझे सदैव ट्रैकिंग के लिये उपयुक्त लगते है, एक तो अनावश्यक बोझ नही होता दूजे कम
 मात्रा में ही अधिक पोषण मिल जाने के कारण ऊर्जा बनी रहती है। हमारी गाड़ी अब मार्ग पर थी
लेकिन डेढ़ किमी चलकर ड्राइवर ने आगे का खतरनाक रास्ता और जमी बर्फ देखकर चलने से मना कर दिया।
जबरदस्ती करने का सवाल ही नही उठता था , वह अपनी जगह सही था। हमने वही से ट्रैकिंग शुरू करने
का निर्णय लिया मेजबान हमारे गाइड की भूमिका में थे, वे आगे बढ़े और हम उनके पीछे। कुछ दूर एक
डेढ़ फीट की भुरभुरी बर्फ में चलने के बाद यही सुंदर और मनमोहक दिखती बर्फ भयंकर थकान का कारण
 बनने लगी। अभी हम कुछ ही दूर चले थे कि थकान होने लगी। मैंने पढ़ रखा था के यहां ऑक्सीजन
 लेवल सामान्य से कम है जिस कारण थकान होती ही है। साली जी थोड़ी थोड़ी दूरी पर जाकर बैठ जाती थी,
उनके बहाने मैं भी आराम कर लेता। लगभग दो किमी बर्फ की ऊंची नीची पगडंडियों पर लड़खड़ाते चलते
 आखिरकार हम तुंगनाथ प्रवेश द्वार पर पहुंचे। साली जी ने पूछा अभी और कितना बाकी है।
 तो मैंने कहां यहां से तो ट्रैकिंग आरंभ होती है। उनके चेहरे पर थकान अवश्य थी लेकिन उत्साह भी
स्पष्ट दिखलाई दे रहा था। गाइड ने हमे दो लाठियां थमा दी जो हमारे हिसाब से बेफिजूल सी थी।
वैष्णों देवी की यात्रा के दौरान ऐसी लाठियां किसी काम नही आने के कारण हमने फेंक दी थी तो
यहां भी वही लगा। किन्तु यही लाठियां इस ट्रैक में सबसे बड़ी मददगार बनने वाली थी। ब्लैक
 टी पीने के पश्चात हमने तुंगनाथ जी के प्रवेशद्वार पर मत्था टेका और हर हर महादेव का जयघोष किया।
 कुछ सेकंड्स का एक वीडियो और फोटोज खींचकर अब हम यात्रा ट्रैक पर पहला पग रख चुके थे।




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