शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

फिल्म एक नजर में : लय भारी ( मराठी २०१४ )

फिल्म एक नजर में : लय भारी ( मराठी २०१४ )
निर्देशक : निशिकांत कामत
निर्माता : जेनेलिया देशमुख ,झी टाकिज ,जितेन्द्र ठाकरे
कहानी : साजिद नडियादवाला
संगीत : अजय अतुल
रितेश देशमुख ने मराठी फिल्म निर्माण में अपने कदम रखे थे उनकी फिल्म ( मराठी ) 
‘बालक पालक ‘ से ! जो के काफी संवेदनशील विषय पर केन्द्रित थी ,
और उसकी सफलता ने मराठी फिल्मो के इतिहास को ही बदल कर रख दिया ! 
पैतीस करोड़ से अधिक की कमाई करनेवाली पहली मराठी फिल्म का तमगा इस फिल्म ने पा लिया ,
अपने अनोखे विषय और मोहक प्रस्तुती के कारण ,खैर इस फिल्म की चर्चा अगली पोस्ट में करूँगा .
फिलहाल आते है ‘रितेश देशमुख ‘ की होम प्रोड्क्शन की दूसरी फिल्म ‘लय भारी ‘ पर ! 
जो के टोटल मसाला फिल्म है ,जिसमे कुछ है तो सिर्फ एंटरटेनमेंट ,
हिंदी फिल्म के लिहाज से देखे तो इस फिल्म में आपको कुछ अलग नहीं दिखेगा ,
किन्तु मराठी फिल्म के लिहाज से इसमें काफी कुछ पहली बार देखने को मिला है !
फिल्म की कहानी : प्रताप निम्बालकर ( उदय टिकेकर ) और उनकी पत्नी सुमित्रा ( तन्वी आजमी ) 
निसंतान है ! प्रताप गाँव के रसूखदार व्यक्ति है ,जो हमेशा दिनों के हित के लिए लड़ते है , 
एक बार सुमित्रा देवी को एक मंदिर में सिर्फ इसलिए पूजा करने के लिए मना कर
 दिया जाता है क्योकि वह बाँझ है .
इससे वह आहत होकर भगवान ‘विट्ठल ‘ की शरण में ‘पंढरपुर ‘ जाती है ! 
और मन्नत मांगती है के यदि भगवान विट्ठल उसे संतान देदे तो वो अपना प्रथम पुत्र भगवान 
विट्ठल को समर्पित कर देगी .
 कुछ समय पश्चात सुमित्रा गर्भवती होती है ,और वह अपने इस मन्नत के बारे में पति को बताती है ! 
जिससे ‘प्रताप ‘ नाराज हो जाता है और लन्दन चला जाता है .
सुमित्रा के पुत्र का जन्म होता है ,और वह प्रताप को बताती है के उसका पुत्र उसके ही पास है ! 
प्रताप ख़ुशी ख़ुशी लौट आता है .
वे पुत्र का नाम ‘प्रिंस ‘ रखते है ,जो विदेश ससे पढाई करके वापस आता है ! 
‘प्रिंस ‘ ( रितेश देशमुख ) के वापस आने से प्रताप का भाई और उसका पुत्र खासे नाराज है ,
क्योकि प्रताप उनके गलत कामो में हमेशा रोड़ा बनता आ रहा है ,’प्रिंस ‘ का चचेरा भाई ‘संग्राम ‘ 
( शरद केलकर ) उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता ! जमीं विवाद के चलते एक साजिश के तहत ‘प्रताप ‘
 की रहस्यमयी मृत्यु हो जाती है जिसमे संग्राम और उसके पिता का हाथ है ,
किन्तु सुमित्रा और प्रिंस इस बात से अनजान है, और प्रताप के कार्यो को आगे बढ़ाना चाहते है.
लेकिन इसी बिच प्रिंस के सामने उसके चाचा और संग्राम की हकीकत खुल जाती है .
जिसके कारण ‘संग्राम ‘ प्रिंस की हत्या कर देता है .
प्रिंस की हत्या के पश्चात जाली कागजात बना कर संग्राम सुमित्रा की साड़ी सम्पत्ति हडप लेता है ! 
और उसे बेघर कर देता है ,
पहले पति और फिर जवान बेटे की मृत्यु से सुमित्रा दुखी हो जाती है ! 
और वह फिर भगवान विट्ठल के दरबार यानी पंढरपुर पहुँच जाती है ,जहा उसकी मुलाक़ात होती है 
‘माउली ‘ ( रितेश देशमुख दोहरी भूमिका में ) से !
 ‘माउली ‘ बहुत ही उग्र स्वभाव का है ,और निडर भी ! वह हर किसी से भीड़ जाता है ,
और एक ईंट भट्टी चलाता है .तब सुमित्रा उसके सामने वर्षो पुराना राज उजागर करती है ‘माउली ‘के सामने ,
के वह सुमित्रा और प्रताप का बेटा है ! दरअसल सुमित्रा को जुड़वाँ पुत्र हुए थे ,
और अपने भगवान ‘विट्ठल ‘ को दिए गए वचन के कारण उसने जुड़वाँ पुत्रो की बात छिपा कर ए
क पुत्र ‘विट्ठल ‘ के मंदिर में ही छोड़ दिया था .
तब ‘माउली ‘अनाथ ही बड़ा हुवा है ! मंदिर के पुजारी ने उसे पाला ,और जब उसने माँ के बारे में पु
छा तो उसे बता दिया के तु इस मंदिर में ‘विट्ठल ‘ के चरणों में मिला था .
तब ‘माउली ‘ विट्ठल को ही अपनी माता और पिता मान लेता है ! वह गलत काम अवश्य करता है 
किन्तु ‘विट्ठल ‘ से डरता है .
सुमित्रा से अपने रिश्ते के बारे में पता चलने पर वह सुमित्रा से नफरत करने लगता है ! 
किन्तु वह उसकी मदद के लिए तैयार हो जाता है और सुमित्रा के साथ गाँव आ जाता है .
अब संग्राम सेर है तो ‘माउली ‘ सवा सेर ! ‘माउली ‘ संग्राम को नाको चने चबवा देता है ,अपनी हरकतों से ,
और फिर शुरू होती है जंग सच्चाई और बुराई की ,निस्संदेह जीत सच्चाई की ही होनी है .
लेकिन कैसे ? यह देखना मजेदार है .
फिल्म भावनाओ और एक्शन का मिला जुला संगम है ! फिल्म की कहानी आपको जरुर बोलीवूड 
की नब्बे के दशक की याद दिलाती होगी किन्तु यह मराठी फिल्मो में एक नए प्रयोग की तरह है ,
और देखना अच्छा भी लगता है ,रितेश देशमुख पहले हाफ में ( प्रिंस के अभिनय में ) बुझे बुझे से 
लगे किन्तु फिल्म के दुसरे हिस्से में जब वह ‘माउली ‘ बन कर उभरते है ,तब से फिल्म गति पकडती 
है तो अंत तक बांधे रखती है .
फिल्म के बैकग्राउंड संगीत का ‘माउली ‘ के चरित्र को विस्तार देने में बड़ा योगदान है ! 
जब भी ‘माउली ‘ने एक्शन के लिए ईंट उठायी है तब तब दर्शक रोमांच से भर उठता है .
और वही संग्राम के रोल में ‘शरद केलकर ‘ अपनी पूरी क्रूरता के साथ आये है ,बाकी ‘सलमान खान ‘ 
द्वारा किया गया ‘कैमियो ‘ भी फिल्म को हल्का फुल्का बनाने में योगदान देता है ! 
सलमान को मराठी बोलते देखकर दर्शक अपनी हंसी पर काबु नहीं रख पाता .
फिल्म के एक्शन दृश्य फिल्म की जान है ! मराठी फिल्मो के लिए यह प्रथम है जब किसी फिल्म मे इस 
तरह के एक्शन देखने को मिले हो .
संगीत पक्ष की बात करे तो सिर्फ एक ही गीत अपना प्रभाव छोड़ता है ‘माउली ,माउली ‘ 
उसके अलावा शीर्षक गीत निष्प्रभावी रहा है ,जिस तरह से शीर्षक गीत की उम्मीद की जाती है 
उसकी कसौटी पर यह गीत खरा नहीं उतरता ! हां इस गीत में ‘जेनेलिया देशमुख ‘ भी कुछ पलो के 
लिए नजर आती है जो देखना अच्छा लगता है .
रितेश देशमुख की शायद यह पहली फिल्म है जिसने उन्होंने एंग्री यंग मेन टाईप की एक्शन पैक्ड भूमिका की है ! चाहे वह मराठी फिल्म हो या हिंदी.
पहली ही मराठी फिल्म से ‘रितेश ‘ छा गए है ! बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने तहलका मचा दिया 
और सुपर हिट की श्रेणी में आ चुकी है ,’’बालक पालक’’ के बाद मराठी में सर्वाधिक कमाई करनेवाली यह दूसरी 
फिल्म है ( एकतीस करोड़ के उपर )
कुल मिला कर यह एक मनोरंजक फिल्म है ! हां फिल्म में ढेर सारी कमियाँ भी दिखती है ,
जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता था ,किन्तु यदि इस बात पर ध्यान न दे तो ही बेहतर .
तीन स्टार

देवेन पाण्डेय 

'प्रभात फेरी '

मुझे अपना वह बचपन याद है जब मै निकर पहने प्रेस किये शर्ट पहन कर चार आने में 
एक कागज का तिरंगा खरीद कर ,एक कागज का बैज शर्ट पर लगाए हुए पंद्रह अगस्त की 
सुबह साढ़े पांच बजे ही अपने मित्रो के साथ स्कुल की और निकल पड़ता !'प्रभात फेरी ' के लिए .
और  स्कुल परेड में नारे लगाने के बजाय सडको पर ही नारे लगाता 'भारत माता की जय '
'वन्दे मातरम ' !! अन्य मित्र भी ,और हम बच्चो की देखा- देखि सुबह सुबह गुजरनेवाले राहगीर ,
दूकान खोलते दुकानदार ,दूधवाले आदि भी हमारे नारों में मिलकर साथ देते थे !
हम चिल्लाते झंडा लहराते हुए ''भारत माता की ......'
और सभी राहगीर सुर में सुर मिलाते 'जय '
कमाल का माहौल होता था वह ! स्कुल में अक्सर इन दिनों कुछ कार्यक्रम होते थे ! 
जिनमे हम भी महीने भर पहले से भाषण का रट्टा मार कर आते थे ,
जब प्राध्यापक और अतिथिगण भाषण देते तो बहुत उकताहट होती थी ! 
लेकिन जब हम बच्चो की बारी आती थी तो गजब का जोश दीखता था ,
हर किसी के पास अपनी पंक्तिया होती थी कहने के लिए ,जिनकी शुरुवात होती थी इन शब्दों से 
'यहाँ उपस्थित मेरे आदरणीय गुरुजन एवं मित्रगण ! मै आजादी के इस पावन अवसर पर दो शब्द कहना चाहूँगा ,’’
यह होती थी शुरुवाती पंक्तिया और खत्म होती थी इन पंक्तियों से
 ‘ इतना कहकर मै अपने दो शब्द समाप्त करता हु ,जय हिन्द जय भारत ‘
और भाषण के बाद जो जबरदस्त तालिया गूंजती थी के पूछो ही मत .
फिर बारी आती रंगारंग कार्यक्रम की ! जिसके लिए हम एक महीने पहले से ही तैय्यारी करते आ रहे थे ,
बुक स्टोर से देशभक्ति के गीतों वाली पुस्तक खरीद कर रखते थे और उनमे से
 लगभग सभी गीतों को याद कर लेते थे ! जिनमे प्रमुख गीत होते थे ,
’मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोति !
नन्हा मुन्ना राही हु देश का सिपाही हु बोलो मेरे संग जय हिन्द जय हिद!
,हम लाये है तूफ़ान से कश्ती निकाल के ,इस देश को रखना मेरे बच्चो सम्भाल के !
अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं !
कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो ,अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो !
‘है प्रीत जहा की रीत सदा मै गीत वहा के गाता हु ,भारत का रहनेवाला हु भारत के गीत सुनाता हु ‘
इतने ही न जाने कितने ही गीत उन दिनों जुबानी याद हो चुके थे ! 
इन गीतों के कैसेट्स भराए जाते थे ,जिन्हें एक टेप में लगाकर रिहर्सल की जाती थी स्कुल में ! 
जिनमे मेरा सबसे पसंदीदा गीत था ‘है प्रीत जहा की रीत सदा ‘ और ‘ जहा डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा ,वह भारत देश है मेरा ‘
इस गीत की पंक्तिया उस समय भी काफी गहरा प्रभाव छोडती थी ,जब हमें पंक्तियों के भावार्थ समझ में नहीं आते थे ! किन्तु इस गीत में वह बात थी जो बचपन में भी समझ में अति थी ,के हमारा भारत ऐसा था ! 
किन्तु अफ़सोस तब भी होता था और अब भी है के इन गीतों वाला भारत नहीं रहा !
फिर भी उम्मीद कायम है ! क्योकि देशभक्ति का जज्बा आज भी वही है जो बचपन में होता था ,
और यह बात आज भी जब बाहर देखो तो समझ में आती है ! 
आज भी नन्हे मुन्हे बच्चो की परेड होते देख मेरा बालमन उसमे खुद को ढूंढता है, के कही वह सफ़ेद निकर वाला बच्चा नजर आये जो झंडा लिए गला फाड़े चिल्ला रहा हो ..
‘’भारत माता की ....’
और भीड़ साथ दे रही हो ‘’ जय !!!!!!!’’
और हां ऐसे बच्चे नजर आते है ,बहुतायत में नजर आते है ! अमुमन हर बच्चा वही लगता है .
तो इतना कहकर मै अपने ‘दो शब्द समाप्त करना चाहूँगा ! धन्यवाद ,जय हिन्द जय भारत ‘ जाते जाते
‘सिकंदर-ए-आज़म (1965)’ फिल्म का ‘मोहम्मद रफी ‘ द्वारा गाये गीत की पंक्तिया प्रस्तुत करना चाहूँगा .
संगीत है ‘हंसराज बहल ‘ का और शब्द है ‘राजिंदर कृष्ण ‘ के

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियां करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा
ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक इक मोहन है और राधा इक-इक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा...
जहाँ गंगा, जमुना, कृष्ण और कावेरी बहती जाए
जहाँ उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम को अमृत पिलवाये
ये अमृत पिलवाये
कहीं ये फल और फूल उगाये, केसर कहीं बिखेरा
वो भारत देश है मेरा...
अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है, होली के कहीं मेले
जहाँ राग-रंग और हँसी-खुशी का चारों ओर है घेरा

वो भारत देश है मेरा...
जहाँ आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले
किसी नगर मे किसी द्वार पर कोई न ताला डाले
और प्रेम की बंसी जहाँ बजाता आये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा...

शनिवार, 9 अगस्त 2014

रिश्तो का बाजार !

( यह कोई लम्बी चौड़ी पोस्ट नहीं है , केवल अपने मन की बात है संक्षेप में )
अब चूँकि त्योहारों का मौसम आ चुका है ! 
इसलिए त्योहारों में रिश्तो की दूकान सजाने 
विदेशी कंपनिया भी अपने काम पर लग चुकी है , 
अब ये जता रहे है मानो इन्हें भारतीय त्योहारों की
 आत्मीयता का पूरा ख्याल है ,'@री मिल्क ' @डबरी ' ऐसे जता रहे है
 मानो 'रक्षाबंधन ' का त्यौहार इनके बिना अधूरा है !
माने भाई बहन का संबंध कुछ भी नहीं है !
रिश्ते में मिठास तो इन्ही के कारण है ! तरह तरह की विदेशी कम्पनिया जिनके 
यहाँ इन रिश्तो की कोई अहमियत नहीं वो भी यहाँ रिश्तो के पाठ पढ़ा रही है ,
मतलब मार्किट बना रही है ! हमें पता ही नहीं चलता और ये विदेशी हमारे त्योहारों
 में अपने मार्केट को ठूंस के रिश्तो को दिन ब दिन 'खोखला और दिखावे ' की वस्तु बनाते जा रहे है !
अब कोई भी शुभ काम करने से पहले 'मीठा ' खिलाने के लिए भी चोकलेट की प्रेरणा इन्ही ने दी है ,
भले ही वह शुभकाम किसी लडकी को फ्लर्ट करने का ही क्यों न हो ! 
( याद ही होगा ,''मेरी माँ ने कहा है कोई भी शुभ काम करने से पहले मिठा जरुर खा लेना ) 
भले ही एक बाईट की भिख मांग लो ! '' लार लिसडी हुयी ,गलती टपकती घिन्न आती
 दुसरे की झूठन चाटने ,वह भी बेटी अपने बाप के सामने अपने बोयफ्रेंड से ,
और बहन भाई के सामने बॉयफ्रेंड के मुंह में मुंह डाले बिजबिजाती चोकलेटी लार चाटती
 हुयी कहेगी 'किस मी क्लोज यूउर आईज ''!!!! 
और ये हमें रिश्तो की अहमियत सिखायेंगे , विकृत कही के .
तो भाईयो और बहनों ....इन विदेशियों की मार्केटिंग का शिकार बनकर 
रिश्तो को औपचारिकता न बनने दे ,हमें इनसे सिखने की जरुरत नहीं ! 
ये तो माल बेचने आए है किन्तु हम रिश्तो का मोल क्यों लगाने लगे ? 
रिश्तो को आत्मीयता से 'मिठा ' बनाईये ,डेरी मी*या @डबरी ' से नहीं .
सभी मित्रो ,एवं बहनों को रक्षा बंधन की शुभकामनाये !

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

भारतीय कॉमिक्स जगत के 'प्राण' ! अंतिम विदाई ( चित्रों में )

भारतीय कॉमिक्स जगत में 'पितामह ' का स्थान रखनेवाले कार्टूनिस्ट 'प्राण ' 
जी ने छह अगस्त को इस दुनिया को अलविदा कह दिया ! 
साथ ही अपने पीछे छोड़ गए अपने लाखो फैन्स की भावनाओं का तूफ़ान ! 
इस खबर पर सहसा किसी को विश्वास नहीं हो रहा था ,हर 
कोई यही मना रहा था के यह भी मात्र 'अफवाह ' हो ! 
किन्तु गुजरते समय के साथ इस बुरी खबर की भी पुष्टि हो गई !
और इसी के साथ उनके फैन्स का बाँध टूट पड़ा और देखते ही देखते
 शोशल साईट्स पर सन्नाटा पसर गया ! 
और इन दुखमय पलो को हर तरह व्यक्त किया गया,शोशल साईट्स पर 'प्राण ' जी 
को हर किसी ने अपने तरीके से अलविदा कहा ,
जिसे देखकर हर किसी की आंखे नम हो गई , गौरतलब है के 'प्राण ' जी को पिछले कई सालो  
से 'कैंसर ' था  ,पिछले दिनों उनका इलाज 'गुडगाँव ' के एक अस्पताल में हो रहा था ,
उन्होंने मंगलवार को अपनी आखरी सांस ली ,और कॉमिक्स जगत को गमगीन छोड़ के चले गए ,
यहाँ इस पोस्ट में शोशल साईट्स पर मौजूद कुछ चित्रों को साभार प्रस्तुत करना चाहूँगा ,
जिन्होंने 'प्राण ' जी के जाने के दर्द को बयान किया .
( सभी चित्रों के क्रेडिट उनके मुल कलाकारों एवं पेजेस को है ! हमने सिर्फ शेयर किया है )
'चित्रकथा ' के पेज से साभार 

'चित्रकथा ' के पेज से साभार 

आम आदमी पार्टी के पेज से साभार 

अभिषेक सिंग के पेज से साभार 

अनुराग चंद्रा जी की पोस्ट 

कार्टूनिस्ट 'इरफ़ान ' की पोस्ट 

Kookage Studio से साभार 

'कुरील ' की पोस्ट ,संता बंता पेज से साभार 

Newsflicks Hindi के पेज से साभार 

'शेखर गुरेरा ' की पोस्ट से साभार 

'सुधाकर ' की पोस्ट से साभार 

'गोपाल शून्य ' की पोस्ट से साभार 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

कार्टूनिस्ट प्राण ! कॉमिक्स जगत के एक युग का अंत

कार्टूनिस्ट प्राण
'चाचा चौधरी ' बिल्लू ,पिंकी ,के रचयिता कार्टूनिस्ट 'प्राण ' नहीं रहे ! 
75 साल की उम्र में उनके निधन से कॉमिक जगत को अपूरणीय क्षति हुयी है ,
बहुत ही दुखभरा समाचार है यह ,हमारे बचपन के सुनहरे क्षणों के साथी ,
और हमें अपनी मनोरंजक कहानियों एवं चित्रों के जरिये गुदगुदानेवाले ''प्राण '' जी की 
मृत्यु की समाचार पर सहसा विश्वास नहीं हुवा !
मन मानने को तैयार ही नहीं के हमारे प्यारे आर्टिस्ट अब नहीं रहे ! 
प्राण साहब कॉमिक्स जगत के एक जीते जागते लिजेंड थे ,जिनके बनाये हर पात्र को आज भी 
याद किया जाता है ,उन दिनों कॉमिक्स में कवर के दुसरे हिस्से में एक तस्वीर छपी रहती थी 
जो हँसते मुस्कुराते ‘प्राण ‘ साहब की होती थी ,
जिन्हें देखने की आदत सी हो गई थी ! प्राण साहब के सरल चित्रों ने कॉमिक्स प्रेमियों 
को दीवाना बना दिया था ,उनकी कहानियों में न कोई भारी ड्रामा होता था और ना ही 
बेफिजूल का एक्शन यदि कुछ होता था तो खालिस मनोरंजन ! चाहे वह नटखट बच्ची ‘पिंकी ‘ के रूप में हो , 
या शैतान बच्चे ‘बिल्लू ‘ के रूप में ,जिसकी आँखे उसके घने बालो से हमेशा ढंकी रहती थी ! 
या आम आदमी की सामान्य समस्याओं से जूझता सीधा साधा चरित्र ‘रमण ‘ 
जिसकी समस्याए ‘महंगाई ,बीवी की फरमाईश ,बाजार का चक्कर ,बिजली राशन का बिल , 
आदि थी ,जिसे बेहद हल्के फुल्के ढंग से प्रस्तुत किया जाता था .
कॉमिक्स जगत के सबसे बुजुर्ग एवं समझदार अक्लमंद चरित्र 'चाचा चौधरी '
ये उस दौर में आये थे जब कम्प्यूटर सबसे तेज हुवा करता था ,
किन्तु इनके आने से ये भ्रम टूट गया के कम्प्यूटर सबसे तेज है ! 
चाचा चौधरी 
क्योकि 'चाचा चौधरी ' का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है !
एकदम सीधी साधी सरल कहानिया ,शुद्ध भारतीय परिवेश के चाचा चौधरी के जन्मदाता थे 
'प्राण ' सर !
जिन्होंने चाचा चौधरी की शुरुवात बतौर स्ट्रिप्स साप्ताहिक पत्रिका 'लोटपोट ' से की !
सर्वप्रथम चाचा जी लोटपोट में नजर आये ,कुछ समय बाद वे अलग से कॉमिक्स 
जगत में एक सोलो चरित्र के रूप में उभरे और बहुत पसंद किये गए !
सामान्य व्यक्ति की आम जिन्दगी में आती आम समस्याओं से चाचा जी तो 
बखुबी निपटते ही थे ! किन्तु राका जैसे फैंटसी किरदार को भी बखुबी संभाल लेते थे !
 डायमंड कॉमिक्स की पहचान बन गए थे चाचा चौधरी यदि आज भी डायमंड में 
से चाचा चौधरी को निकाल दिया जाए तो लोग डायमंड क्या है ये शायद जान 
पाए चाचा जी का साथ निभाते थे जुपिटर गृह से आया भीमकाय व्यक्ति साबू ! 
जिसने चाची जी उर्फ़ बिनी के हाथो के बने 'परांठे ' खाए तो धरती का ही होकर रह गया ,
साबू के बारे में प्रसिद्ध था के 'जब साबू को गुस्सा आता है तब कही ज्वालामुखी फूटता है '
‘प्राण’ जी का असल नाम प्राण कुमार शर्मा है ! 
इनका जन्म १५ अगस्त, १९३८ को कसूर नामक कस्बे में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है ,
जिस समय हमारे यहाँ विदेशी नायको की भरमार हवा करती थी ! उस समय प्राण जी ने शुद्ध देसी चरित्रों की रचना की ,जिन्हें आम जनमानस में खूब पसंद किया गया , 
क्या बच्चे क्या बूढ़े सभी सामान रूप से प्राण जी द्वारा बनाए गए चरित्र ‘चाचा चौधरी ‘ 
के दीवाने थे ! उस दौर में रहनेवाला शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जिसने चाचा चौधरी 
का नाम न सुना हो .
भारतीय कॉमिक जगत के सबसे सफल और लोकप्रिय रचयिता कार्टूनिस्ट प्राण ने सन १९६० से कार्टून बनाने की शुरुआत की. अमरीका के इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ कार्टून आर्ट में उनकी बनाई कार्टून स्ट्रिप चाचा चौधरीको स्थाई रूप से रखा गया है. सन १९८३ में देश की एकता को लेकर उनके द्वारा बनाई गयी कॉमिक रमन- हम एक हैंका विमोचन तत्कालीन प्रधान मन्त्री स्व. इन्दिरा गांधी ने किया था. ( उपरोक्त पंक्तिया ,चाचा चौधरी की हर कॉमिक्स के सम्पादकीय पन्ने पर छपी रहती थी  )बहुत कम लोग जानते है के ‘चम्पक ‘ पत्रिका का नन्हा खरगोश ‘चीकू’ भी प्राण सर जी का निर्माण था ! चीकू वर्षो तक चम्पक में निरंतर प्रकाशित होता रहा ,
एक या दो पेज की कहानी में चीकू की बुद्धिमानी एवं सुझबुझ बच्चो को सिख दे जाती थी ,
बाद में प्राण जी ने चीकू पर काम करना बंद किया क्योकि वे ‘चम्पक ‘ से अलग हो चुके थे ,
उसके बाद से ‘चीकू ‘ को ‘दास ‘ जी बनाने लगे ! यह सन १९८० की बात ,उन्होंने लगातार कई पात्रो का सृजन किया जो कही न कही हमारे समाज से ही उठाये गए थे ! और वे भी उन्ही परेशानियों से जूझते थे जिससे आम आदमी दो चार होता था ,इसी कारण से इन पात्रो की लोकप्रियता आज भी कायम है ,बिल्लू, पिन्की, तोषी, रमण ,श्रीमतीजी ,गब्दू, बजरंगी पहलवान, चाचा चौधरी ,साबू ,जोजी, ताऊजी, आदि तमाम पात्र जनमानस में सालों से बसे हुए हैं.
हमारे बचपन और हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके प्राण साहब अब नहीं रहे ,
 यह खबर हर कॉमिक्स फैन के लिए दुखदायी है ! उनकी कमी हमेशा बनी रहेगी ,इनके साथ ही भारतीय कॉमिक जगत के एक युग का अंत हो गया ,किन्तु प्राण साहब अपने बनाये पात्रो के जरिये हमेशा अपने चाहनेवालो के हृदय में बसे रहेंगे .

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे .

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